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परंपरा और तकनीक का संगम: जनजातीय कार्य मंत्रालय ने किया ‘आदि संस्कृति’ डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्म का शुभारंभ

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नई दिल्ली, जनजातीय कार्य मंत्रालय ने आज ‘आदि संस्कृति’ का बीटा संस्करण लॉन्च किया – एक अभिनव डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्म जो जनजातीय कला रूपों के संरक्षण, आजीविका संवर्धन और भारत की जनजातीय समुदायों को विश्व से जोड़ने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। इस प्लेटफॉर्म का औपचारिक शुभारंभ जनजातीय कार्य मंत्रालय के राज्य मंत्री दुर्गादास उइके द्वारा राष्ट्रीय सम्मेलन ‘आदि कर्मयोगी अभियान’ के दौरान किया गया।

‘आदि संस्कृति’ को विश्व का पहला डिजिटल विश्वविद्यालय बनाने की परिकल्पना की गई है, जो जनजातीय समुदायों की संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण व संवर्धन के साथ-साथ जनजातीय शिल्पकारों के उत्पादों को वैश्विक स्तर पर पहुँचाने के लिए ऑनलाइन मार्केटप्लेस भी होगा। यह प्लेटफॉर्म तीन प्रमुख घटकों को एकीकृत करता है:

  1. आदि विश्वविद्यालया (डिजिटल ट्राइबल आर्ट अकादमी): वर्तमान में 45 पाठ्यक्रम, जिनमें जनजातीय नृत्य, चित्रकला, शिल्प, संगीत और लोककथाएँ शामिल।

  2. आदि संपदा (सामाजिक-सांस्कृतिक भंडार): 5 विषयों पर आधारित 5,000 से अधिक संकलित दस्तावेज़ – चित्रकला, नृत्य, वस्त्र एवं परिधान, शिल्पकृतियाँ और आजीविका।

  3. आदि हाट (ऑनलाइन मार्केटप्लेस): फिलहाल TRIFED से जुड़ा हुआ, आगे चलकर इसे जनजातीय शिल्पकारों के लिए एक समर्पित डिजिटल बाज़ार के रूप में विकसित किया जाएगा।

राज्य स्तरीय जनजातीय अनुसंधान संस्थानों (TRIs) की सहभागिता

‘आदि संस्कृति’ को राज्य स्तरीय जनजातीय अनुसंधान संस्थानों (TRIs) की साझेदारी से विकसित किया जा रहा है, ताकि स्थानीय भागीदारी, प्रामाणिकता और विविधता सुनिश्चित हो। पहले चरण में आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मेघालय, ओडिशा, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश के TRIs ने दस्तावेज़ीकरण, सामग्री संकलन और डिजिटल मैपिंग में योगदान दिया है।

शुभारंभ समारोह से विचार

दुर्गादास उइके ने अपने संबोधन में कहा कि मंत्रालय अनुसूचित जनजातियों के उत्थान और उनकी धरोहर के संरक्षण के लिए निरंतर प्रयासरत है। उन्होंने पहले लॉन्च किए गए ‘आदि वाणी’ (AI-आधारित जनजातीय भाषा अनुवादक) का उल्लेख किया और उम्मीद जताई कि ऐसे उपकरण लोकतांत्रिक संस्थानों में भी उपयोगी सिद्ध होंगे।

उन्होंने कहा, “शिक्षा से संपदा और फिर हाट तक – ‘आदि संस्कृति’ एक समग्र मंच है। यह जनजातीय समुदायों की संस्कृति, विरासत और कला रूपों का भंडार है। इसके माध्यम से अब कोई भी व्यक्ति जनजातीय संस्कृति और आजीविका के खजाने से सीधे जुड़ सकता है।”

अनंत प्रकाश पांडेय, संयुक्त सचिव, जनजातीय कार्य मंत्रालय ने कहा कि ‘आदि संस्कृति’ विकसित भारत @2047 की दिशा में सांस्कृतिक संरक्षण और जनजातीय सशक्तिकरण की एक महत्वपूर्ण पहल है। उन्होंने लोगों से पोर्टल का उपयोग करने और इसे और समृद्ध बनाने हेतु सुझाव देने का आग्रह किया।

आगे की राह

मंत्रालय ने पुष्टि की है कि ‘आदि संस्कृति’ को चरणबद्ध तरीके से विस्तारित किया जाएगा, जिसमें और अधिक पाठ्यक्रम, संग्रहण और बाज़ार से एकीकरण शामिल होगा। दीर्घकालिक लक्ष्य इसे एक जनजातीय डिजिटल विश्वविद्यालय में विकसित करना है, जो प्रमाणन, उन्नत अनुसंधान और नवाचारी शिक्षण पथ प्रदान करेगा।

संरक्षण, शिक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण को एक साथ लाते हुए, ‘आदि संस्कृति’ भारत के जनजातीय समुदायों की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित और प्रोत्साहित करने के साथ-साथ उन्हें डिजिटल ज्ञान अर्थव्यवस्था में सक्रिय भागीदार बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर है।


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