Media24Media.com: पद्म विभूषण तीजन बाई का निधन, पंडवानी की अमर आवाज हुई खामोश

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पद्म विभूषण तीजन बाई का निधन, पंडवानी की अमर आवाज हुई खामोश

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 रायपुर। छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को विश्व पटल पर नई पहचान दिलाने वाली प्रसिद्ध पंडवानी गायिका एवं पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का रविवार तड़के रायपुर स्थित एम्स अस्पताल में निधन हो गया। उन्होंने इलाज के दौरान सुबह 3:15 बजे अंतिम सांस ली। वे 72 वर्ष, 2 महीने और 11 दिन की थीं। लंबे समय से गंभीर बीमारियों से जूझ रही तीजन बाई के निधन से छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश के कला और संस्कृति जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।


24 अप्रैल 1956 को दुर्ग जिले के गनियारी गांव में जन्मीं डॉ. तीजन बाई के पिता का नाम हुकुमचंद परधा और माता का नाम सुखवाती बाई था। वे छत्तीसगढ़ की पारधी अनुसूचित जनजाति से संबंध रखती थीं। बचपन में अपने नाना ब्रजलाल पारधी से महाभारत की कथाएं सुनते-सुनते उन्हें पंडवानी से गहरा लगाव हो गया। बाद में उन्होंने उमेद सिंह देशमुख से इस लोकगायन की अनौपचारिक शिक्षा प्राप्त की।

महज 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपना पहला सार्वजनिक मंच प्रदर्शन किया। उस समय महिलाएं प्रायः बैठकर 'वेदमती शैली' में पंडवानी प्रस्तुत करती थीं, लेकिन तीजन बाई ने परंपराओं को तोड़ते हुए पुरुषों के वर्चस्व वाली 'कापालिक शैली' को अपनाया। हाथ में तंबूरा लेकर खड़े होकर दमदार आवाज और सशक्त अभिनय के साथ उनकी प्रस्तुति ने पंडवानी को नई पहचान दिलाई।

उनकी असाधारण प्रतिभा को प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर ने पहचाना, जिसके बाद उनके कला जीवन ने नई ऊंचाइयों को छुआ। उन्होंने देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सहित अनेक विदेशी राष्ट्राध्यक्षों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी प्रस्तुतियों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया। इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, तुर्की, मॉरीशस समेत 17 से अधिक देशों में पंडवानी का प्रदर्शन कर उन्होंने छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति का गौरव बढ़ाया।

कला के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें वर्ष 1988 में पद्मश्री, 1995 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2003 में पद्म भूषण, 2018 में प्रतिष्ठित जापानी 'फुकुओका पुरस्कार' तथा 2019 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'पद्म विभूषण' से सम्मानित किया गया। इसके अलावा बिलासपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट. की मानद उपाधि भी प्रदान की थी।

जीवन के अंतिम वर्षों में तीजन बाई लगातार स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रही थीं। बड़े बेटे के निधन के बाद उन्होंने रक्तचाप की दवा लेना बंद कर दिया था, जिसके कारण वर्ष 2024 में उन्हें लकवा (पैरालिसिस) हो गया। इसके बाद उनका स्वास्थ्य लगातार गिरता गया और वे लंबे समय तक बिस्तर पर रहीं।

हाल ही में फेफड़ों में पानी भरने, निमोनिया और लो ब्लड प्रेशर की शिकायत के बाद 27 मई को उन्हें एम्स रायपुर के क्रिटिकल केयर यूनिट में भर्ती कराया गया था। डॉक्टरों की लगातार निगरानी और उपचार के बावजूद रविवार तड़के 3:15 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली।

डॉ. तीजन बाई का निधन छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और भारतीय लोककला के लिए एक अपूरणीय क्षति है। अपनी अद्वितीय कला, सशक्त व्यक्तित्व और अमूल्य सांस्कृतिक विरासत के माध्यम से वे हमेशा देश-दुनिया के कला प्रेमियों के दिलों में जीवित रहेंगी।

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