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व्यक्ति को महान उसकी संगत बनाता है, जैसी संगत वैसी रंगत : हिमांशु कृष्ण भारद्वाज

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Mahasamund। अच्छे लोग केवल द्वापर या त्रेता में ही नही हुए, बल्कि कलयुग में भी हुए है। चाणक्य, दयानंद, विवेकानंद, कबीरदास ये कलयुग के लोग है। जिनका अनुशरण और गुणगान लोग करते है। सही अर्थो में व्यक्ति को महान उसकी संगत बनाता है। इसलिए अपने संतानों को अच्छे संस्कार दो। दादाबाड़ा में चल रहे श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ सप्ताह के अंतर्गत प्रथम दिवस गौकर्ण कथा का बखान करते हुए व्यासपीठ से भगवताचार्य हिमांशु कृष्ण भारद्वाज ने कही। उन्होंने छोटे-छोटे प्रसंगों का जिक्र करते हुए उपस्थित भगवत प्रेमी श्रद्धालुओं से कहा कि जो बच्चे माता-पिता का सम्मान नही करते उन्हें जीवन में कभी सम्मान नही मिलता। इसलिए बच्चों को अपने माता-पिता का सम्मान करना चाहिए। गौकर्ण, धुंधकारी की कथा के साथ ही उन्होंने एक किसान का उदाहरण देते हुए बताया कि उन्होंने अपने पुत्र को डाक्टर बनाया लेकिन डाक्टर द्वारा अपने पिता के साथ किए बर्ताव को देखकर जब किसान की मृत्यु हो गई तो उसके नाती ने अंतिम समय में अपने पिता से कहा कि इसे रहने दो यह आपके अंतिम समय में काम आएगा। कहने का आशय यह है कि तो तुम्हारे घर में घटित हो रहा उसका प्रभाव बच्चों पर अवश्य पड़ता है। 




  व्यक्ति का जैसा संगत होता है उसका रंगत वैसा ही हो जाता है। धुंधली और आत्मदेव को कोई संतान नही था इससे आत्मदेव दुखी रहते थे। एक दिन वे संत के पास गए और अपनी व्यथा बताई। संत दूरदृष्टा थे, उन्होंने अपने तपोबल से यह जान लिया कि आत्मदेव का सात जन्मों तक पुत्र नही है। इस पर आत्मदेव दुखी होकर संत के चरणों में गिर गए, संत ने करूणा दिखाई और एक फल प्रदान करते हुए कहा कि मेरे पुण्यबल से यह फल अपनी पत्नी को खिला दो वह पुत्रवती हो जाएगी। इस पर आत्मदेव ने ऐसा ही किया किंतु धुंधली को पुत्र नही चाहिए था, उसने अपनी सहेली से बात की तो उसकी गर्भवती सहेली ने अपना संतान देने का वचन दिया। इधर संत से मिले फल को उन्होंने गौ को खिला दिया। समय बीतने पर धुंधली के सहेली पुत्र हुआ जिसे उसने धुंधली का सौप दिया। इधर समय बीतने पर गौ माता ने भी अपने पुत्र को जन्म दिया। नामकरण की बारी आई तो अच्छे-अच्छे नाम आत्मदेव ने सुझाया लेकिन धुंधली को पसंद नही आया और उन्होंने अपने पुत्र का धुंधकारी रख दिया। आत्मदेव ने गौ माता के पुत्र का सुंदर नामकरण करते हुए गौकर्ण नाम रखा। समय बीतता गया और मां के प्यार-दुलार से धुंधकारी बिगडऩे लगा। युवावस्ता में उन्होंने चोरी शुरू कर दी। अपने पुत्र के व्यवहार से दुखी होकर आत्मदेव घर छोड़कर चले गए। धुंधली ने भी आत्महत्या कर ली। 

धुंधकारी प्रेत बनकर गांव वालों को सताने लगा


अब धुंधकारी को रोकने वाला कोई नही था तो उन्होंने परस्त्रीगमन करते हुए पांच-पांच महिलाएं रख ली, जिसके लिए वह चोरी करने लगा यह बात धीरे-धीरे राजा तक पहुंची तो वेश्यावृत्रि करने वाली महिलाओं ने इस भय से धुंधकारी की हत्या कर दी कि कही राजा ने उन्हे भी अपराधी मानकार सजा न दे दे। मृत्यु के बाद धुंधकारी प्रेत बनकर गांव वालों को सताने लगा। दूसरी ओर गौकर्ण महाराज अपने पिता के संगत के कारण उनकी चित साधु-संतों की हो गई और वह भ्रमण करते हुए जब अपने गांव पहुंचा तो देखा कि उनका घर खंडहर हो गया है। वही रात गुजारने के लिए रूका तो धुंधकारी उसे सताने लगा इस पर गौकर्ण महाराज समझ गया कि वह प्रेतबाधा है और वह मंत्र पाठ करने लगे तब धुंधकारी ने बताया कि वह उसका भाई है और प्रेतयोनी में है और मुक्ति के लिए अनुनन-विनय करने लगा इस पर दूसरे दिन से गौकर्ण महाराज ने भागवत कथा सुनाना शुरू किया जिससे धुंधकारी को प्रेतयोनी से मुक्ति मिली। उन्होंने भगवत प्रेमी जनता से आह््वान किया कि जो बच्चे अपने माता-पिता की सेवा नही करते वह घर भी धुंधकारी के घर की तरह खंडहर हो जाता है। इसलिए बच्चों को हमेशा अपने माता-पिता का सम्मान करना चाहिए।

पेन डायरी लेकर आएं भागवत कथा सुनने


भागवत श्रवण करने आने वाले लोगों को चाहिए कि वे अपने साथ कापी, पेन लेकर आए और प्रमुख अंशों को लिख लिया करे नही तो तेरा तुझको अर्पण की भावना से कथा श्रवण कर इसी स्थान पर छोड़कर चले गए। आजकल यही हो रहा है लोग कथा सुनते जरूरी  है लेकिन अनुसरण नही करते। प्रथम दिवस भागवत पुरान के प्रथम श्लोक से कथा का शुभारंभ करते हुए हिमांशु कृष्ण भारद्वाज ने कहा कि भक्त और भगवान के मिलन की कथा ही भागवत है। यहां भगवान विराजमान है और अपने भक्तों की अगुवानी के लिए पधारे हुए है। यहा प्रतिदिन दोपहर 2 से शाम 6 बजे तक भागवत कथा का आयोजन 30 मार्च तक किया गया है। नगर की सुख समृद्धि, शांति और जन कल्याण की भावना से नगरवासियों द्वारा यह आयोजन किया गया है। मुख्य जजमान नपाध्यक्ष प्रकाश चंद्राकर व उनकी धर्मपत्नी ललिता चंद्राकर व समिति के सदस्यों ने मजराज जी का पुष्पहार से अभिनंदन कर भागवत भगवान की आरती की।

Murder In Mahasamund : जोबा में ऐसे हुआ महाभारत, जानिए जमीन कैसे बना जी का जंजाल

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अशोक कुमार साहू





रायपुरः छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 75 किमी दूर स्थित है गांव जोबा। महासमुंद जिले के इस गांव की आधा आबादी बाबा गुरूघासीदास के अनुयायी सतनामी समाज के लोगों की है। बाबा ने सत्य-अहिंसा और नशामुक्ति का पाठ पढ़ाया, यह हम सब जानते हैं। लेकिन, यहां बाबा के अनुयायी एक परिवार की बेइमानी ने महाभारत करा दिया। कहा जाता है कि जर-जोरू-जमीन ये तीन ही संसार में सभी फसाद की जड़ हैं। कुरूक्षेत्र का महाभारत- हस्तिानपुर में सुई के नोंक के बराबर जमीन नहीं देने संबंधी दुर्योधन के उद्गार से शुरू हुआ। जो कौरव वंश के समूल नाश का कारण बना। ऐसा ही घटना महासमुंद जिले के जोबा गांव में घटित हुआ। जमीन का बंटवारा नहीं देना एक परिवार के लिए जी का जंजाल बन गया। ।




और महज 6 एकड़ जमीन के बंटवारा के लिए अब तक चार हत्याएं हो चुकी है। हत्या करने वालों की योजना तो बड़े भाई के खानदान को समूल नष्ट करने का था। लेकिन, ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था। इसके चलते उनकी योजना सफल नहीं हो पायी।




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हत्यारोपी: चेहरे पर जरा भी सिकन नहीं





हाथों में हथियार लिए खड़े ये दोनों पिता-पुत्र पर त्रिपल मर्डर का आरोप है। तुमगांव थाना में इनके खिलाफ घर में बलात प्रवेश कर हत्या और हत्या का प्रयास का अपराध पंजीबद्ध हुआ है। अपने ही सगे भाई-भतीजों और रिश्तेदारों को मौत के घाट उतारने के बाद भी इनके चेहरे पर जरा भी सिकन नहीं है। हत्या का आरोपी परसराम गायकवाड़ तो अपने भतीजे की हत्या का दोषाभियुक्त रहा है। वह अपने भतीजा धनीराम की हत्या के लिए दस साल की सजा काटकर कुछ महीने पहले ही जेल से रिहा हुआ है। पिता के जेल जाने और खुद दाने-दाने के लिए मोहताज होने से परसराम के बेटे बज्रसेन के मन में भी नफरत घर कर गया था। बाप-बेटे के मन में भरा नफरत का गुबार योजनाबद्ध तरीके से हत्या की साजिश बनकर निकला।





आंख में मिर्ची पाउडर डालकर मारा





महासमुंद डीएसपी नारद सूर्यवंशी बताते हैं कि हत्यारोपी परसराम 62 और उनका बेटा बज्रसेन 27 दोनों ने हत्या की योजना बनाई। मिर्ची पाउडर लेकर ओसराम के घर के बाहर खड़े थे। सुबह करीब चार बजे जागृति नींद से जागकर शौच आदि के लिए जा रही थी। उसके आंखों में मिर्ची पाउडर डालकर धारदार हथियार से गला रेत दिया। बाद दोनों बाप-बेटा घर में प्रवेश कर गए। पत्नी जागृति की चीख-पुकार सुनकर घर से निकल रहे ओसकुमार पर भी दोनों ने संघातिक वार किया। वह जख्मी होने के बाद जैसे-तैसे वहां से भागकर जान बचाया और अपने बड़े भाई खिलावन को जगाया।




इस बीच हत्या की योजना बनाकर घर में घुसे बाप-बेटे ने सब्बल से एक कमरे के दरवाजे को तोड़ा और कमरे में सो रही टीना का गला रेत दिया। इस बीच टीना का नौ साल का भाई मनीष भागकर घर से बाहर निकला तो उसे दोनों ने दौड़ाकर पकड़ लिया और गला रेतकर हत्या कर दी।




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एक के बाद एक सात लोगों पर किया वार





आरोपित बाप-बेटे ने एक के बाद एक सात लोगों पर वार किया। परसराम की भाभी अनारबाई 60 पति सादराम का गला रेता। उसे मृत समझकर ओसकुमार की 15 साल की गूंगी बेटी गीतांजलि और 11 साल के बेटे ओमन पर भी वार किया। दोनों बाप-बेटे के सिर में खून सवार था। वे वहशी दरिंदे की तरह ओसकुमार को मारने के लिए ढूंढ रहे थे। जिससे कि वे उसे मारकर जमीन हासिल कर सकें। लेकिन, ओसकुमार ने वहां से भागकर ग्रामीणों को घटना की जानकारी दी। जिससे आरोपी बाप-बेटे की योजना पूरी तरह से सफल नहीं हो पायी। त्वरित उपचार मिलने से चार की जान फिलहाल बच गई है। गंभीर रूप से घायल ओसकुमार, गीतांजलि, अनारबाई और ओमन रायपुर के चिकित्सालय में भर्ती हैं।





यह है जमीन विवाद की जड़




इस जमीन विवाद को समझने के लिए तीन पीढ़ी की कहानी जानना जरूरी है। जोबा में लुड़गू सतनामी के दो बेटे हुए बड़ा सादराम और छोटा परसराम गायकवाड़( हत्यारोपी)। लुड़गू के पैतृक संपत्ति करीब 6 एकड़ का दोनों भाई के बीच बंटवारा होना था। जो विधिवत नहीं हुआ। आपसी बंटवारा से तीन-तीन एकड़ जमीन को खेती करके जीवन बसर कर रहे थे। ब़ड़े भाई सादराम के तीन बेटे हुए धनीराम, खिलावन और ओसकुमार। इधर, छोटे भाई परसराम का एक बेटा हुआ बज्रसेन गायकवाड़ (हत्यारोपी)।




लुड़गू की मौत के बाद पूरी जमीन बड़े भाई सादराम के नाम पर लंबरदारी में दर्ज हुआ। सादराम, तीन बेटों के जवान होने और बड़े होने से सबल हो गया। इधर, परसराम का बेटा छोटा था। जमीन के स्वामित्व और कब्जा को लेकर अक्सर भाई और भतीजों के बीच विवाद होता था। इससे आवेश में आकर एक दिन परसराम ने अपने बड़े भतीजे धनीराम की हत्या कर डाली। तब उसका बेटा ब्रजसेन नाबालिग था। भतीजे की हत्या न्यायालय में प्रमाणित होने से परसराम को दस साल की कैद की सजा सुनाई गई। वह सजा पूरी करके अभी कुछ समय पहले ही जेल से रिहा हुआ है।




पिता-पुत्र ने मिलकर बनाई हत्या की योजना





जेल की सजा काटने और जमीन नहीं मिलने से दोनों पिता-पुत्र के मन में नफरत घर कर गया था। कुछ महीने पहले बज्रसेन पलायन करके अन्य प्रांत में रोजी-रोटी की तलाश में गया था। जहां से कटार जैसे धारदार हथियार लेकर आया था। वह बलौदाबाजार जिले में अपने मामा के घर रह रहा था। इस बीच पिता के जेल से छूटने पर दोनों ने मिलकर हत्या करने और अपनी जमीन वापस हथियाने की योजना बनाई। करीब महीनेभर पहले दोनों बाप-बेटा अपने पैतृक गांव जोबा आए। जहां उन्हें रहने को घर नहीं मिला तो कांजी हाउस को आशियाना बना लिए। और खानदानी जमीन पर खेती कर रहे ओसकुमार के परिवार को निशाना बनाकर उनकी दिनचर्या पता करते रहे। जब उन्हें यकीन हो गया कि सुबह चार बजे के समय में हत्या की जा सकती है। तब योजनाबद्ध तरीके से मिर्ची पाउडर लेकर और हथियार लेकर आज सुबह धावा बोल दिया।





आठ साल पहले धनीराम का हुआ निधन





यह पुरानी रंजिश की अजब-गजब कहानी है। परसराम ने करीब आठ साल पहले अपने बड़े भतीजे धनीराम की हत्या कर दी थीं। जागृति उसी की धर्मपत्नी थी। बाद में जागृति ने पति की मौत का बदला लेने की ठानी और अपने देवर ओसकुमार से शादी कर ली। उसने योजनाबद्ध तरीके से वंशवृद्धि की। टीना, गीतांजलि दो बेटी और ओम तथा मनीष दो बेटों को उन्होंने जन्म दिया। अपने पहले पति की मौत का बदला लेने की बात अक्सर वह गुस्से में अपने चाचा ससुर के बेटे बज्रसेन से कहती थी। यह उसे नागवार गुजरा और अपने पिता के साथ मिलकर हत्या की योजना बना डाली





जमीन के बंटवारे को लेकर उपजा संघर्ष महाभारत में तब्दील हो गया। महज छह एकड़ जमीन का बंटवारा जी का जंजाल बन गया। जागृति का परिवार बिखर गया। जागृति और उसके दो बच्चों की मौत हो गई। वहीं उसकी सास, पति और दो बच्चे जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं।


CM साहब ! जनता के प्रति जवाबदेह नहीं है महासमुन्द जिला प्रशासन ?

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क्या जनता के प्रति जवाबदेह नहीं है महासमुन्द का जिला प्रशासन? यह अहम सवाल मेरे जैसे सैकड़ों कलमकारों के जेहन में है। इसका जवाब छत्तीसगढ़ सरकार के मुखिया से मांगने का समय अब आ गया है। वह इसलिए, क्योंकि जब जन सामान्य कोरोना संकटकाल में अनेक परेशानियों से जूझ रहा है। उन्हें लॉकडाउन नियमों का पालन, आजीविका के लिए उपाय करने की चिंता है। कोरोना संक्रमण का खतरा उठाते हुए भी मीडियाकर्मी बखूबी अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। तब जिला प्रशासन के आला अधिकारियों का रवैया गैर जिम्मेदाराना भला कैसे हो सकता है?





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निरंतर बन रही संवादहीनता की स्थिति से अनेक गलतफहमियां पैदा हो रही है। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के ज्यादातर साथियों का कहना है कि जिला प्रशासन के मुखिया न तो फोन कॉल अटेंड करते हैं। और सोशल मीडिया में जानकारी मांगने पर भी कोई जवाब देना उचित नहीं समझते हैं।





जिला कार्यालय में भी ऐसी व्यवस्था कर रखे हैं कि मीडिया के प्रतिनिधि उनसे मिल नहीं सकते। अनेक पत्रकारों ने बताया कि आधा से पौन घंटे तक इंतजार के बाद भी मिलने का उन्हें समय नहीं दिया जा रहा है। इस तरह की शिकायतें लगातार मिल रही है। इससे जनता और शासन-प्रशासन के बीच का सेतुबंध टूटने लगा है।





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समन्वय स्थापित करने में मीडिया की भूमिका अहम





जनता और शासन-प्रशासन के बीच समन्वय स्थापित करने में मीडिया की भूमिका अहम है। इसे नकारा नहीं जा सकता है। मीडिया की कड़ी टूटेगी तो सभी की दिक्कतें बढ़ना स्वाभाविक है। यहां आम आदमी परेशान हैं। गरीबों को दो वक्त की रोटी के लाले पड़ रहे हैं। रोज कमाने-खाने वाले हजारों लोग भूखे मरने के कगार पर हैं। एसी कमरे में कांच के घेरे में बैठे अफसरों की नजर में जमीनी स्तर पर सबकुछ ठीक चल रहा है। जबकि, जमीनी हकीकत इससे अलग है। इनकी तकलीफ को शासन-प्रशासन तक मीडिया ही पहुंचाती है। जिसकी अनदेखी और असहयोग से सभी परेशान हैं। जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली से सभी वर्ग के लोग आहत हैं।





यहां लोक सेवक समझने लगे हैं खुद को खुदा





जन सामान्य के बीच यह चर्चा का विषय है कि लोकसेवक यहां खुद को खुदा समझने लगे हैं। इस स्थिति में विद्रोह होना स्वाभाविक है। मैदानी क्षेत्रों से लोक सेवकों की मनमानी की ढेरों शिकायतें मिल रही है। जनता से जुड़े मुद्दे कलमकार प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, सोशल मीडिया पर लगातार उठा रहे हैं। सूचना क्रांति के वर्तमान समय में सब कुछ बहुत तेजी से वायरल हो जाता है। बावजूद संज्ञान में लेना तो दूर मामला उजागर करने वाले को ही संदेह की नजरों से देखा जाने लगा है।





ऐसा हुआ एक ताजा मामला





सोशल मीडिया पर "महासमुन्द जिले की खबरें" व्हाट्सएप्प ग्रुप में आज एक प्रकरण वायरल हुआ। पिथौरा के तहसीलदार ने पटवारी को नोटिस दिया है, उसे एक मीडिया प्रतिनिधि ने ग्रुप में शेयर किया। जिले के इस महत्वपूर्ण ग्रुप में कल रात भी कुछ मसलों पर कलमकारों की तीखी प्रतिक्रिया आई थी। सूत्रों के अनुसार यह अफसरों को नागवार गुजरा। लॉकडाउन के मसले पर मंथन करने पुलिस और प्रशासन के अधिकारी जिला कार्यालय में एकत्र थे। तब इस व्हाट्सएप्प ग्रुप पर चर्चा हुई। और जिला प्रशासन के तीन शीर्ष अफसर एक साथ लेफ्ट हो गए।





CM साहब ! जनता के प्रति जवाबदेह नहीं है महासमुन्द जिला प्रशासन ?









सोशल मीडिया पर पोस्ट के बाद एक साथ लेफ्ट हुए ये अधिकारी।









किसी ग्रुप में रहना, हट जाना निश्चय ही संबंधित का विशेषाधिकार है। लेकिन, अहम सवाल यह है कि जनता से जुड़े मामलों पर क्या आला अधिकारी जवाबदेही से बचने का प्रयास कर रहे हैं? जब शीर्ष अफसरों का रवैय्या ऐसा नकारात्मक रहेगा, तो जमीनी अमला आम आदमी का काम कहां करने वाले हैं। बहरहाल, अधिकारियों के एक साथ ग्रुप छोड़ने से मीडियाकर्मियों से जुड़े इस ग्रुप में तरह- तरह की चर्चाएं हो रही है।





बड़ों का अनुशरण करते हैं छोटे





यह प्रकृति का नियम है कि बड़ों का अनुशरण छोटे करते हैं। जब तीन शीर्ष अफसर एक साथ ग्रुप से लेफ्ट हुए। तब छोटे कहां पीछे रहने वाले हैं। इस ग्रुप से सहायक जनसंपर्क अधिकारी भी लेफ्ट हो गए। अधिकारियों के नकारात्मक रवैया से रूष्ट होकर ग्रुप के एडमिन ने उन्हें अन्य ग्रुपों से भी रिमूव कर दिया। क्या ये किसी प्रकार की जवाबदेही से बच रहे हैं? सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के बीच शुतुरमुर्ग वाला व्यवहार किसी के हित में नहीं है। मीडिया, प्रशासन, शासन सबकी जनता के प्रति बराबर जवाबदेही है। और मीडिया को चौथे स्तंभ का दर्जा भारतीय लोकतंत्र में ऐसे ही नहीं मिला है। यह बात खुद को खुदा समझने वाले नौकरशाह को बखूबी समझना ही चाहिए।





आनंदराम साहू
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व प्रेस क्लब-महासमुन्द के अध्यक्ष हैं)


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