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भारतीय नौसेना को 30 महीने के लिए मिलेंगे दो MQ-9B Sea Guardian ड्रोन, 1,943 करोड़ रुपये का हुआ करार

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General Atomics के साथ रक्षा मंत्रालय ने किया समझौता, हिंद महासागर क्षेत्र में निगरानी क्षमता होगी मजबूत

नई दिल्ली- रक्षा मंत्रालय ने भारतीय नौसेना के लिए दो MQ-9B Sea Guardian High-Altitude Long-Endurance (HALE) Remotely Piloted Aircraft Systems (RPAS) को 30 महीने की अवधि के लिए लीज पर लेने हेतु General Atomics Aeronautical Systems Inc. (GA-ASI) के साथ अनुबंध पर हस्ताक्षर किए हैं। इस करार की कुल कीमत लगभग 1,943 करोड़ रुपये है।

यह अनुबंध 17 अगस्त 2026 को नई दिल्ली स्थित कर्तव्य भवन-2 में रक्षा मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव एवं महानिदेशक (अधिग्रहण) ए. अंबारासु की उपस्थिति में संपन्न हुआ।

समुद्री निगरानी क्षमता होगी और मजबूत

MQ-9B Sea Guardian HALE RPAS अत्याधुनिक प्रणालियों, आधुनिक सेंसर और उन्नत पेलोड से लैस हैं। इनके शामिल होने से भारतीय नौसेना की Maritime Domain Awareness (MDA) यानी समुद्री क्षेत्र में गतिविधियों की निगरानी और जानकारी जुटाने की क्षमता में महत्वपूर्ण बढ़ोतरी होगी।

ये सिस्टम समुद्री क्षेत्र के विशाल इलाकों में लगातार खुफिया जानकारी, निगरानी और टोही (ISR) उपलब्ध कराने में सक्षम होंगे। इससे हिंद महासागर क्षेत्र में होने वाली गतिविधियों पर भारत की नजर और मजबूत होगी तथा किसी भी महत्वपूर्ण घटनाक्रम पर समय रहते निगरानी एवं प्रतिक्रिया देने की क्षमता बढ़ेगी।

यह करार भारत की समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने और हिंद महासागर क्षेत्र में निरंतर निगरानी क्षमता विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

भारत ने स्वदेशी ‘GARUD’ हाई-रेजोल्यूशन दूरबीन लॉन्च की, रक्षा क्षेत्र की तकनीक अब आम नागरिकों के लिए उपलब्ध

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नई दिल्ली- रक्षा उत्पादन विभाग के अधीन मिनी रत्न श्रेणी-I रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम इंडिया ऑप्टेल लिमिटेड (IOL) ने नागरिक बाजार के लिए स्वदेशी ‘GARUD’ हाई-रेजोल्यूशन बाइनोक्युलर्स (दूरबीन) लॉन्च किए हैं। इसका विकास और निर्माण इंडिया ऑप्टेल लिमिटेड की इकाई ऑर्डनेंस फैक्ट्री, देहरादून ने किया है।

‘GARUD’ को स्वदेशी डिजाइन और निर्माण के जरिए ‘आत्मनिर्भर भारत’ की भावना को मजबूत करने वाले उत्पाद के रूप में विकसित किया गया है। वर्ष 1943 से सटीक ऑप्टिकल उपकरणों के निर्माण की विरासत रखने वाली ऑर्डनेंस फैक्ट्री ने रक्षा क्षेत्र में अपने अनुभव और आधुनिक तकनीक को मिलाकर इस दूरबीन को तैयार किया है।

8x मैग्निफिकेशन और 7.6 डिग्री का विस्तृत दृश्य क्षेत्र

‘GARUD’ में 8x मैग्निफिकेशन और 7.6 डिग्री का विस्तृत फील्ड ऑफ व्यू दिया गया है। इससे दूर की वस्तुओं को स्पष्ट रूप से देखने के साथ-साथ व्यापक क्षेत्र का अवलोकन किया जा सकता है।

दूरबीन में व्यक्तिगत दृष्टि के अनुसार समायोजन के लिए ±5 डायोप्टर एडजस्टमेंट, लंबे समय तक आरामदायक उपयोग के लिए सॉफ्ट-टच आईकप और बेहतर पकड़ के लिए एर्गोनोमिक डिजाइन दिया गया है। इसका वेदर-रेसिस्टेंट निर्माण विभिन्न बाहरी परिस्थितियों में भरोसेमंद उपयोग सुनिश्चित करता है।

लगभग 610 ग्राम वजन वाली ‘GARUD’ को पोर्टेबल और मजबूत बनाया गया है। इसका उपयोग बर्डवॉचिंग, वन्यजीव अवलोकन, प्रकृति भ्रमण, यात्रा, खेल, वानिकी, समुद्री गतिविधियों और सुरक्षा संबंधी कार्यों में किया जा सकता है।

रक्षा क्षेत्र के अनुभव से नागरिक बाजार तक पहुंची तकनीक

‘GARUD’ की लॉन्चिंग के साथ इंडिया ऑप्टेल लिमिटेड ने नागरिक ऑप्टिक्स बाजार में प्रवेश किया है। यह उत्पाद दशकों से भारतीय रक्षा बलों और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के लिए विकसित की गई ऑप्टिकल तकनीक को आम नागरिकों और पेशेवर उपयोगकर्ताओं तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

यह दूरबीन ऐसे ऑप्टिकल प्लेटफॉर्म पर आधारित है, जिसने चुनौतीपूर्ण परिचालन परिस्थितियों में रक्षा बलों और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के लिए विश्वसनीय उपकरण के रूप में लंबे समय तक सेवा दी है।

नई दिल्ली में हुआ लॉन्च

स्वदेशी ‘GARUD’ हाई-रेजोल्यूशन बाइनोक्युलर्स का औपचारिक शुभारंभ 13 अगस्त 2026 को नई दिल्ली स्थित DPSU भवन में संयुक्त सचिव (लैंड सिस्टम्स) डॉ. गरिमा भगत की उपस्थिति में किया गया।

इस अवसर पर रक्षा उत्पादन विभाग, युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों और वाइल्डलाइफ सोसाइटी ऑफ इंडिया के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। इंडिया ऑप्टेल लिमिटेड के निदेशक मंडल के सदस्य और वरिष्ठ अधिकारी भी कार्यक्रम में शामिल हुए।

‘GARUD’ का लॉन्च भारत की स्वदेशी रक्षा तकनीक और आत्मनिर्भर विनिर्माण क्षमता को नागरिक उपयोग तक पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

सीएसआईआर ने आयोजित किया प्रौद्योगिकी हस्तांतरण कार्यक्रम, चार स्वदेशी तकनीकें उद्योगों को सौंपीं

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नई दिल्ली- वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) ने आज नई दिल्ली स्थित अपने मुख्यालय में प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (Technology Transfer) कार्यक्रम आयोजित किया। कार्यक्रम का आयोजन सीएसआईआर-केंद्रीय वैज्ञानिक उपकरण संगठन (CSIR-CSIO), चंडीगढ़ द्वारा किया गया, जिसमें वैज्ञानिकों, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों, प्रौद्योगिकी अपनाने वाले संस्थानों और अन्य प्रमुख हितधारकों ने भाग लिया।

इस अवसर पर चार स्वदेशी प्रौद्योगिकियों का उद्योगों को हस्तांतरण, ग्रामीण क्षेत्रों के लिए आईओटी (IoT) आधारित जल सेवा वितरण, मापन एवं निगरानी प्रणाली का व्यावसायिक शुभारंभ तथा भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL), पंचकूला से स्वदेशी रक्षा प्रौद्योगिकियों के लाइसेंस प्राप्त उत्पादन पर मिली रॉयल्टी का उल्लेख किया गया।

कार्यक्रम में सीएसआईआर की महानिदेशक एवं डीएसआईआर की सचिव डॉ. एन. कलैसेल्वी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं। उनके साथ सीएसआईआर-सीएसआईओ के निदेशक प्रो. शांतनु भट्टाचार्य, वरिष्ठ वैज्ञानिक, अधिकारी एवं उद्योग जगत के प्रतिनिधि भी मौजूद रहे।

प्रो. शांतनु भट्टाचार्य ने बताया कि इंडक्शन मोटर स्टेथोस्कोप (MSCOPE), पोर्टेबल एंड यूनिवर्सल मोटर-कम-पंप परफॉर्मेंस मॉनिटर (PU-MPPM) तथा आई-पावर क्वालिटी एनालाइज़र (IPQA) जैसी तकनीकों का लाइसेंस एम/एस पंप अकादमी प्राइवेट लिमिटेड, बेंगलुरु को दिया गया है। वहीं, एसयू-30 विमान के लिए हेड-अप डिस्प्ले (HUD) का ऑप्टिकल मॉड्यूल एवं बीम कंबाइनर असेंबली तकनीक भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL), पंचकूला को हस्तांतरित की गई।

उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों के लिए विकसित किफायती आईओटी आधारित जल सेवा वितरण, मापन एवं निगरानी प्रणाली के व्यावसायिक शुभारंभ की भी घोषणा की। यह प्रणाली जल की गुणवत्ता, मात्रा और सेवा वितरण की आधुनिक एवं प्रभावी निगरानी सुनिश्चित करेगी।

प्रो. भट्टाचार्य ने बताया कि वित्तीय वर्ष 2025-26 में BEL, पंचकूला से स्वदेशी सैन्य एवियोनिक्स तकनीकों—जिनमें हेड-अप डिस्प्ले (HUD), ड्रोग लाइट्स, टैक्सी लैंडिंग लाइट्स, HUD-I लेवल टेस्टर और बोरसाइट अलाइनमेंट टूल शामिल हैं—के लाइसेंस प्राप्त उत्पादन के लिए 1.67 करोड़ रुपये की रॉयल्टी प्राप्त हुई है। उन्होंने इसे भारतीय उद्योग के साथ सीएसआईआर-सीएसआईओ की मजबूत साझेदारी और स्वदेशी रक्षा विनिर्माण में उसके महत्वपूर्ण योगदान का प्रमाण बताया।

अपने संबोधन में डॉ. एन. कलैसेल्वी ने सफल प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और व्यावसायीकरण के लिए सीएसआईआर-सीएसआईओ की टीम को बधाई दी। उन्होंने कहा कि स्वदेशी तकनीकों का सफल व्यावसायीकरण, अनुसंधान को उद्योग एवं समाज के लिए उपयोगी उत्पादों और प्रक्रियाओं में बदलने की दिशा में सीएसआईआर के मिशन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने वैज्ञानिकों से राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और 'आत्मनिर्भर भारत' के विज़न के अनुरूप उद्योगोन्मुख अनुसंधान को आगे बढ़ाने का आह्वान किया।

कार्यक्रम का समापन सीएसआईआर-सीएसआईओ के बिजनेस डेवलपमेंट ग्रुप (BDG) के प्रमुख द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जारी किया DRDO का नया वित्तीय अधिकार ढांचा (DFP-2026), रक्षा अनुसंधान को मिलेगी नई गति

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नई दिल्ली- रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 29 जून 2026 को रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के लिए डेलीगेशन ऑफ फाइनेंशियल पावर्स-2026 (DFP-2026) जारी किया। यह नया वित्तीय ढांचा रक्षा अनुसंधान एवं विकास परियोजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण सुधार माना जा रहा है।

प्रमुख बातें

  • DFP-2026 से रक्षा अनुसंधान परियोजनाओं को समय पर मंजूरी और वित्तीय स्वीकृति मिलेगी।

  • रक्षा तकनीकों, हथियार प्रणालियों और प्लेटफॉर्म्स का तेजी से उत्पादन और सेना में शामिल किया जा सकेगा।

  • उद्योग, स्टार्टअप और शैक्षणिक संस्थानों के साथ साझेदारी को बढ़ावा मिलेगा।

  • यह पहल आत्मनिर्भर भारत अभियान को मजबूत करेगी और स्वदेशी रक्षा तकनीकों के विकास में तेजी लाएगी।

नए ढांचे की विशेषताएं

  • परीक्षण, ट्रायल और मूल्यांकन गतिविधियों के लिए अलग वित्तीय प्रावधान।

  • परियोजना शुरू होने से पहले अनुसंधान एवं विकास (Pre-Project R&D) को मंजूरी देने का अधिकार।

  • Extra-Mural Research Projects, Defence Innovation Accelerator – Centres of Excellence तथा Technology Development Fund परियोजनाओं के लिए अलग-अलग वित्तीय अधिकार निर्धारित किए गए हैं।

  • DRDO के विभिन्न स्तरों पर अधिकारियों को अधिक वित्तीय अधिकार देकर निर्णय प्रक्रिया को तेज बनाया जाएगा।

रक्षा मंत्री ने क्या कहा?

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि नया वित्तीय ढांचा रक्षा अनुसंधान को अधिक प्रभावी बनाएगा, उद्योग और अकादमिक संस्थानों के साथ सहयोग बढ़ाएगा तथा देश की रक्षा तैयारियों को और मजबूत करेगा। उन्होंने कहा कि यह सुधार रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को नई गति देगा।

इस अवसर पर चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान, रक्षा सचिव एवं DRDO के अध्यक्ष राजेश कुमार सिंह, रक्षा उत्पादन सचिव संजीव कुमार, पूर्व सैनिक कल्याण सचिव सुकृति लिखी सहित रक्षा मंत्रालय और DRDO के कई वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

भारतीय नौसेना के युद्धपोत थाईलैंड पहुंचे, भारत-थाईलैंड समुद्री सहयोग को मिलेगा नया आयाम

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नई दिल्ली- भारतीय नौसेना के पूर्वी बेड़े (Eastern Fleet) के युद्धपोत आईएनएस उदयगिरि, आईएनएस कवरत्ती और आईएनएस शक्ति दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में अपने परिचालन तैनाती कार्यक्रम के तहत थाईलैंड के सत्ताहीप (Sattahip) बंदरगाह पहुंच गए हैं।

इस बेड़े का नेतृत्व रियर एडमिरल आलोक आनंद, फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग ईस्टर्न फ्लीट, कर रहे हैं। थाईलैंड पहुंचने पर रॉयल थाई नेवी ने भारतीय नौसैनिक दल का गर्मजोशी से स्वागत किया।

यह पोर्ट कॉल भारत और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ बढ़ते समुद्री सहयोग का हिस्सा है तथा भारत और थाईलैंड के बीच लंबे समय से चले आ रहे मजबूत समुद्री संबंधों को और सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

कई संयुक्त गतिविधियों का होगा आयोजन

इस दौरे के दौरान दोनों देशों की नौसेनाओं के बीच कई पेशेवर और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इनमें—

  • पेशेवर विचार-विमर्श (Professional Exchanges)

  • क्रॉस-डेक विजिट

  • संयुक्त परिचालन गतिविधियां

  • खेल प्रतियोगिताएं

  • सामुदायिक संपर्क कार्यक्रम (Community Outreach)

शामिल हैं। इन गतिविधियों का उद्देश्य दोनों नौसेनाओं के बीच आपसी सहयोग, समन्वय (Interoperability) और विश्वास को और मजबूत करना है।

भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमता का प्रदर्शन

यह यात्रा भारतीय नौसेना के स्वदेशी रूप से डिजाइन और निर्मित अत्याधुनिक युद्धपोतों की क्षमता को भी प्रदर्शित करती है। आईएनएस उदयगिरि, आईएनएस कवरत्ती और आईएनएस शक्ति आधुनिक तकनीक, मॉड्यूलर निर्माण और उन्नत रक्षा प्रणालियों से लैस हैं, जो भारत की बढ़ती रक्षा उत्पादन क्षमता और तकनीकी आत्मनिर्भरता को दर्शाते हैं।

इस पोर्ट कॉल के माध्यम से भारत ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि वह रक्षा प्रौद्योगिकी और समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में एक विश्वसनीय साझेदार के रूप में अपनी भूमिका को लगातार मजबूत कर रहा है।

डीआरडीओ के स्वदेशी ‘नेत्र’ AEW&C सिस्टम को मिली अंतिम परिचालन मंजूरी, भारतीय वायुसेना को सौंपा गया FOC प्रमाणपत्र

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बेंगलुरु- भारत ने रक्षा तकनीक में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। Defence Research and Development Organisation (DRDO) द्वारा विकसित स्वदेशी ‘नेत्र’ एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (AEW&C) सिस्टम को अंतिम परिचालन मंजूरी (Final Operational Clearance - FOC) मिल गई है। इस अवसर पर भारतीय वायुसेना को आधिकारिक रूप से FOC प्रमाणपत्र सौंपा गया।

यह प्रणाली भारतीय वायुसेना, डीआरडीओ और उद्योग जगत के सहयोग से विकसित की गई है। इसका उद्देश्य हवाई निगरानी, युद्धक्षेत्र की वास्तविक समय की जानकारी (Situational Awareness) और बैटल मैनेजमेंट क्षमताओं को मजबूत करना है। इससे भारतीय वायुसेना की परिचालन क्षमता और रणनीतिक दक्षता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

बेंगलुरु में आयोजित समारोह की अध्यक्षता वायुसेना के उप प्रमुख एयर मार्शल अवधेश कुमार भारती ने की। कार्यक्रम में पूर्व वायुसेना प्रमुख आर.के.एस. भदौरिया, पूर्व डीआरडीओ अध्यक्ष डॉ. एस. क्रिस्टोफर, डीआरडीओ और भारतीय वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारी तथा उद्योग जगत के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

अपने संबोधन में एयर मार्शल अवधेश कुमार भारती ने स्वदेशी नेत्र AEW&C सिस्टम की उपलब्धि की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रणाली ने ऑपरेशन सिंदूर और 2019 बालाकोट एयर स्ट्राइक जैसे अभियानों में अपनी विश्वसनीयता और प्रभावशीलता साबित की है। उन्होंने कहा कि स्वदेशी तकनीकें बदलते युद्ध परिदृश्यों के अनुसार आवश्यक संशोधन और उन्नयन की सुविधा प्रदान करती हैं।

डीआरडीओ के एरोनॉटिक्स क्लस्टर की महानिदेशक डॉ. के. राजलक्ष्मी मेनन ने नेत्र परियोजना की विकास यात्रा और सामने आई तकनीकी चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि मजबूत सिस्टम इंजीनियरिंग और सटीक परीक्षण प्रक्रिया ने परियोजना को सफल बनाने में अहम भूमिका निभाई।

इलेक्ट्रॉनिक्स क्लस्टर के महानिदेशक डॉ. बी.के. दास ने कहा कि डीआरडीओ, भारतीय वायुसेना और उद्योग क्षेत्र के बीच उत्कृष्ट तालमेल ही इस परियोजना की सफलता का आधार रहा है। उन्होंने नेत्र AEW&C को आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया।

कार्यक्रम के दौरान परियोजना में योगदान देने वाले विभिन्न संगठनों और इकाइयों को सम्मानित भी किया गया। अधिकारियों ने कहा कि नेत्र AEW&C प्रणाली का सफल परिचालन भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमताओं को नई ऊंचाई प्रदान करेगा और यह वैज्ञानिक संस्थानों, रक्षा उत्पादन इकाइयों तथा सैन्य बलों के बीच मजबूत सहयोग का उत्कृष्ट उदाहरण है।


डीआरडीओ ने लंबी दूरी की भूमि आक्रमण क्रूज़ मिसाइल (LRLACM) का सफल उड़ान परीक्षण किया

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नई दिल्ली- रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने 15 जून 2026 को ओडिशा तट स्थित डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वीप से लॉन्ग रेंज लैंड अटैक क्रूज़ मिसाइल (LRLACM) का सफल उड़ान परीक्षण किया। परीक्षण के सभी निर्धारित उद्देश्यों को पूर्णतः हासिल कर लिया गया। यह पुष्टि चांदीपुर स्थित एकीकृत परीक्षण रेंज (ITR) द्वारा तैनात विभिन्न ट्रैकिंग उपकरणों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर की गई।

एलआरएलएसीएम एक स्वदेशी रूप से विकसित मिसाइल है, जिसके सभी उप-प्रणालियों का विकास डीआरडीओ की विभिन्न प्रयोगशालाओं तथा भारतीय उद्योग साझेदारों द्वारा किया गया है। इस परियोजना की नोडल प्रयोगशाला एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (ADE), बेंगलुरु है।

मिसाइल के प्रक्षेपण के दौरान डीआरडीओ के वरिष्ठ अधिकारी तथा भारतीय नौसेना और भारतीय वायु सेना के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एलआरएलएसीएम के सफल उड़ान परीक्षण पर डीआरडीओ की टीम और उद्योग साझेदारों को बधाई दी। उन्होंने इसे भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता और स्वदेशी रक्षा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया।

रक्षा सचिव, रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग (R&D) के सचिव तथा डीआरडीओ के अध्यक्ष राजेश कुमार सिंह ने प्रक्षेपण के दौरान सभी गतिविधियों की निगरानी की। उन्होंने सफल परीक्षण में योगदान देने वाले सभी वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और टीम सदस्यों को बधाई दी।

यह सफल परीक्षण भारत की लंबी दूरी की सटीक प्रहार क्षमता को और सशक्त बनाने के साथ-साथ रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

भारत की रक्षा शक्ति को बड़ी मजबूती: DRDO के तीन सफल उड़ान परीक्षण

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रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने विभिन्न प्रकार के दुश्मन खतरों के खिलाफ देश की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने वाली कई महत्वपूर्ण तकनीकों का सफल प्रदर्शन किया है। 10 और 11 जून 2026 को लगातार तीन उड़ान परीक्षण (फ्लाइट-टेस्ट) किए गए, जिनके माध्यम से लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों के विरुद्ध बहु-स्तरीय रक्षा तथा मध्यम दूरी की एंटी-शिप क्षमता का प्रदर्शन किया गया।

बहु-स्तरीय बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस (BMD) क्षमता का सफलतापूर्वक प्रदर्शन किया गया। इंटरसेप्टर मिसाइलों ने अपने-अपने लक्ष्यों को सफलतापूर्वक निशाना बनाया। इन प्रणालियों को नवीनतम तकनीकों के साथ विकसित किया गया है ताकि उभरते हुए मिसाइल खतरों का प्रभावी ढंग से मुकाबला किया जा सके।

इन परीक्षणों के साथ भारत उन चुनिंदा देशों के समूह में शामिल हो गया है जिनके पास इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) तक को निष्क्रिय करने में सक्षम BMD प्रणाली उपलब्ध है। इसके अलावा, नेवल एंटी-शिप मिसाइल – मीडियम रेंज (NASM-MR) का पहला उड़ान परीक्षण भी सफलतापूर्वक किया गया। इन परीक्षणों को DRDO और सशस्त्र बलों के वरिष्ठ अधिकारियों ने प्रत्यक्ष रूप से देखा।

राजनाथ सिंह ने इन महत्वपूर्ण तकनीकों के सफल प्रदर्शन के लिए DRDO को बधाई दी।

DRDO के अध्यक्ष एवं रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव राजेश कुमार सिंह ने परीक्षणों की निकटता से निगरानी की और DRDO तथा उद्योग जगत के संयुक्त प्रयासों की सराहना की।

टीडीबी ने एयरोस्पेस, रक्षा और ईवी चार्जिंग कनेक्टरों के स्वदेशी व्यावसायीकरण हेतु टीआईईए कनेक्टर्स को दिया समर्थन

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भारत को उन्नत विनिर्माण और रणनीतिक प्रौद्योगिकियों का वैश्विक केंद्र बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अंतर्गत प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड ने बेंगलुरु स्थित TIEA Connectors Pvt. Ltd. को “एयरोस्पेस, रक्षा एवं इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए एयरबोर्न कनेक्टर्स और चार्जिंग कनेक्टर्स के व्यावसायीकरण” परियोजना के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की है।

इस परियोजना का उद्देश्य एयरोस्पेस, रक्षा, अंतरिक्ष और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी जैसे रणनीतिक एवं उभरते क्षेत्रों के लिए उच्च-विश्वसनीयता (High-Reliability) वाले विद्युत इंटरकनेक्ट सिस्टम के डिजाइन और निर्माण में भारत की स्वदेशी क्षमताओं को सुदृढ़ करना है।

विद्युत कनेक्टर आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक एवं इलेक्ट्रोमैकेनिकल प्रणालियों के अत्यंत महत्वपूर्ण घटक हैं, जो कठिन परिचालन परिस्थितियों में भी ऊर्जा, सिग्नल और डेटा के निर्बाध संचार को सुनिश्चित करते हैं। एयरोस्पेस, रक्षा और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में इनकी विश्वसनीयता और सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि इन्हें अत्यधिक कंपन, झटकों, तापमान और पर्यावरणीय दबावों के बीच कार्य करना पड़ता है।

टीआईईए द्वारा विकसित तकनीक उन्नत कंपन-प्रतिरोधी (Vibration-Resistant) संपर्क संरचना पर आधारित है, जो अत्यधिक गतिशील परिस्थितियों में भी स्थिर विद्युत प्रदर्शन सुनिश्चित करती है। इसमें एक स्वामित्वयुक्त (Proprietary) मल्टी-पॉइंट इलास्टिक कॉन्टैक्ट मैकेनिज्म का उपयोग किया गया है, जो संपर्क स्थिरता बढ़ाने, विद्युत प्रतिरोध कम करने और तीव्र कंपन के दौरान भी सिग्नल बाधित होने से रोकने में सक्षम है।

यह तकनीक 100G तक के कंपन स्तर पर भी विश्वसनीय विद्युत संपर्क बनाए रखने में सक्षम है, जिससे यह मिशन-क्रिटिकल एयरोस्पेस, रक्षा और अंतरिक्ष अनुप्रयोगों के लिए उपयुक्त बनती है। इन कनेक्टरों का निर्माण उच्च-प्रदर्शन बेरीलियम कॉपर (BeCu) मिश्रधातु से किया जाता है और इनमें विशेष लॉकिंग मैकेनिज्म लगाए गए हैं ताकि कठोर परिस्थितियों में भी सुरक्षित एवं स्थायी विद्युत संपर्क बना रहे।

रणनीतिक उपयोगों के लिए इन कनेक्टरों पर चांदी और सोने की प्लेटिंग भी की जाती है, जिससे बेहतर चालकता, जंग-प्रतिरोध और दीर्घकालिक विश्वसनीयता सुनिश्चित होती है।

यह परियोजना भारत सरकार की ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल और रक्षा, एयरोस्पेस तथा उन्नत विनिर्माण क्षेत्रों में महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों के स्वदेशीकरण के लक्ष्य के अनुरूप है। कंपनी ने उत्पाद डिजाइन, इंजीनियरिंग, टूलिंग, प्रोटोटाइपिंग, परीक्षण और विनिर्माण तक की संपूर्ण क्षमताएं देश में विकसित की हैं, जिससे आयातित तकनीकों पर निर्भरता कम होगी।

यह तकनीक भारत के तेजी से बढ़ते इलेक्ट्रिक वाहन (EV) क्षेत्र की आवश्यकताओं को भी पूरा करेगी और मजबूत एवं विश्वसनीय चार्जिंग कनेक्टर समाधान उपलब्ध कराएगी। इससे घरेलू आपूर्ति श्रृंखला मजबूत होगी, तकनीकी आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा और उच्च-मूल्य इलेक्ट्रॉनिक घटकों के क्षेत्र में वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता विकसित होगी।

इस अवसर पर टीडीबी के सचिव राजेश कुमार पाठक ने कहा कि एयरोस्पेस, रक्षा, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी में भारत की बढ़ती क्षमताओं के लिए स्वदेशी उच्च-प्रदर्शन घटकों का विकास अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि टीडीबी रणनीतिक और उच्च-विकास वाले क्षेत्रों के लिए वैश्विक स्तर की तकनीक विकसित करने वाले भारतीय उद्यमों को समर्थन देने के लिए प्रतिबद्ध है।

टीआईईए कनेक्टर्स के प्रवर्तकों ने टीडीबी के सहयोग के लिए आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इससे कंपनी को अपनी स्वदेशी कनेक्टर तकनीकों के व्यावसायीकरण में तेजी लाने और एयरोस्पेस, रक्षा, अंतरिक्ष, इलेक्ट्रिक वाहन तथा औद्योगिक बाजारों की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए विनिर्माण क्षमता का विस्तार करने में सहायता मिलेगी।


भारतीय नौसेना के लिए 20 उन्नत जीएनएसएस जैमर खरीदने हेतु रक्षा मंत्रालय ने 449 करोड़ रुपये के अनुबंध पर किए हस्ताक्षर

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रक्षा मंत्रालय ने भारतीय नौसेना के लिए 20 उन्नत क्षमता वाले ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (Enhanced Capability Global Navigation Satellite System - ECGNSS) जैमर की खरीद के लिए Accord Software and Systems Private Limited के साथ 449 करोड़ रुपये का अनुबंध किया है। इस प्रणाली में न्यूनतम 75 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया जाएगा।

यह अनुबंध 10 जून 2026 को राजेश कुमार सिंह की उपस्थिति में नई दिल्ली में हस्ताक्षरित किया गया। यह खरीद ‘बाय (इंडियन-इंडिजिनसली डिजाइन्ड, डेवलप्ड एंड मैन्युफैक्चर्ड)’ श्रेणी के अंतर्गत की गई है।

इस अत्याधुनिक प्रणाली की प्रमुख क्षमताओं में दुश्मन के ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (GNSS) रिसीवर की सिग्नल प्राप्ति और ट्रैकिंग क्षमता को बाधित करना, सिग्नल स्पूफिंग तथा भ्रामक जैमिंग (Deceptive Jamming) शामिल है। इसके शामिल होने से भारतीय नौसेना के युद्धपोत बहु-खतरा (Multi-Threat) वातावरण में अधिक सुरक्षित और प्रभावी ढंग से संचालन कर सकेंगे।

यह अनुबंध सरकार की ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ पहल के प्रति प्रतिबद्धता को और मजबूत करता है तथा देश की समुद्री सुरक्षा संरचना को सुदृढ़ बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। साथ ही, यह उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकी के स्वदेशीकरण और भारत की रक्षा क्षमताओं को सशक्त बनाने के प्रयासों में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि भी है।


भारत ने एडवांस अग्नि मिसाइल का सफल परीक्षण किया

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भारत ने 8 मई 2026 को ओडिशा स्थित डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टार्गेटेबल री-एंट्री व्हीकल (MIRV) प्रणाली से लैस एडवांस अग्नि मिसाइल का सफल परीक्षण किया।

इस मिसाइल का परीक्षण कई पेलोड्स के साथ किया गया, जिन्हें हिंद महासागर क्षेत्र में अलग-अलग रणनीतिक लक्ष्यों पर सफलतापूर्वक निशाना बनाया गया।

मिसाइल की पूरी उड़ान पर नजर रखने के लिए कई ग्राउंड और जहाज आधारित ट्रैकिंग स्टेशनों का उपयोग किया गया। इन प्रणालियों ने लॉन्च से लेकर सभी पेलोड्स के लक्ष्य पर पहुंचने तक मिसाइल की पूरी ट्रैजेक्टरी को ट्रैक किया। परीक्षण के आंकड़ों से पुष्टि हुई कि मिशन के सभी उद्देश्य सफलतापूर्वक पूरे किए गए।

इस सफल परीक्षण के साथ भारत ने एक बार फिर यह साबित किया कि वह एक ही मिसाइल प्रणाली से कई रणनीतिक लक्ष्यों को निशाना बनाने में सक्षम है। इस अत्याधुनिक मिसाइल का विकास Defence Research and Development Organisation (DRDO) की प्रयोगशालाओं ने देशभर के उद्योगों के सहयोग से किया है।

परीक्षण के दौरान DRDO के वरिष्ठ वैज्ञानिकों और भारतीय सेना के अधिकारियों की उपस्थिति रही।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस सफल परीक्षण के लिए DRDO, भारतीय सेना और उद्योग जगत को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि देश की रक्षा तैयारियों को और मजबूत करेगी तथा बढ़ते सुरक्षा खतरों के बीच भारत की सामरिक क्षमता में महत्वपूर्ण वृद्धि करेगी।

भारत की रक्षा यात्रा में तकनीक और आत्मनिर्भरता का नया युग: डॉ. जितेंद्र सिंह

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केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), पृथ्वी विज्ञान, और प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा एवं अंतरिक्ष मामलों के राज्य मंत्री  जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत अपने रक्षा क्षेत्र के निर्णायक चरण में प्रवेश कर चुका है, जहां तकनीक, स्वदेशी नवाचार और निजी क्षेत्र की भागीदारी देश की वैश्विक पहचान को नया आकार दे रही है।

प्रयागराज में आयोजित नॉर्थ टेक संगोष्ठी 2026 को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि आधुनिक युद्ध अब केवल भौतिक शक्ति पर आधारित नहीं रह गया है, बल्कि यह उन्नत तकनीक, रियल-टाइम डेटा सिस्टम और स्वचालित प्लेटफॉर्म पर निर्भर हो गया है।

उन्होंने बताया कि पिछले एक दशक में भारत रक्षा उपकरणों के बड़े आयातक से उभरते हुए निर्यातक के रूप में बदल गया है। इस अवधि में रक्षा उत्पादन ₹1.54 लाख करोड़ तक पहुंचा, जो 174% की वृद्धि दर्शाता है, जबकि रक्षा निर्यात ₹23,622 करोड़ तक पहुंच गया, जिसमें 34 गुना वृद्धि दर्ज की गई है।

मंत्री ने कहा कि निजी क्षेत्र ने लगभग ₹15,000 करोड़ के निर्यात में योगदान दिया है, जो रक्षा उत्पादन में एक बड़े परिवर्तन को दर्शाता है।

उन्होंने बताया कि वर्तमान बजट 2026-27 में रक्षा क्षेत्र के लिए ₹6,81,000 करोड़ का प्रावधान किया गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 9.5% अधिक है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्वांटम टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्र अब रक्षा तैयारियों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। भारत ने क्वांटम-सुरक्षित संचार तकनीक में भी तेजी से प्रगति की है, जो भविष्य के युद्ध प्रणालियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

उन्होंने कहा कि सरकार की नीतियों और फंडिंग से अनुसंधान, विकास और नवाचार का मजबूत इकोसिस्टम तैयार हो रहा है।

नॉर्थ टेक संगोष्ठी 2026 का आयोजन 4 से 6 मई तक “रक्षा त्रिवेणी संगम – जहां तकनीक, उद्योग और सैनिक मिलते हैं” थीम पर किया जा रहा है। यह कार्यक्रम भारतीय सेना के उत्तरी और केंद्रीय कमांड तथा SIDM द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया है।

इसमें 280 से अधिक उद्योग भागीदार और 284 स्टॉल शामिल हैं, जहां अत्याधुनिक रक्षा तकनीकों का प्रदर्शन किया जा रहा है। कार्यक्रम में लाइव डेमो, तकनीकी प्रदर्शनी और स्टार्टअप्स, उद्योग एवं सेना के बीच संवाद सत्र भी शामिल हैं।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता तकनीकी संप्रभुता पर आधारित है और सहयोगात्मक प्रयासों से देश भविष्य की रक्षा तकनीक में वैश्विक नेतृत्व की ओर बढ़ रहा है।

ऑपरेशन सिंदूर की सफलता में स्वदेशी रक्षा तकनीक की अहम भूमिका: संजय सेठ

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 “भारत की सैन्य शक्ति हमारे रक्षा उद्योगों के कारखानों में गढ़ी जाती है,” यह बात रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ ने कही। उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर की सफलता का श्रेय सशस्त्र बलों के अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प को दिया, जिसे स्वदेशी अत्याधुनिक हथियारों और प्रणालियों की प्रभावशीलता ने और मजबूत किया।

5 मई 2026 को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में आयोजित नॉर्थ टेक संगोष्ठी को संबोधित करते हुए उन्होंने सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम को भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ और स्टार्ट-अप्स को देश का ब्रांड एंबेसडर बताया। उन्होंने कहा, “हमारे स्टार्ट-अप्स और सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम भविष्य की वृद्धि के प्रमुख चालक हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘विकसित भारत 2047’ के विजन को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। वे हमारे युग के विश्वकर्मा हैं।”

रक्षा राज्य मंत्री ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान आतंकवादी ठिकानों को नष्ट कर भारत के दुश्मनों की साजिशों को विफल करने के लिए सशस्त्र बलों की सराहना की। उन्होंने कहा कि ‘मेक इन इंडिया’ उपकरणों का प्रभावी उपयोग सरकार, रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों, निजी क्षेत्र, नवोन्मेषकों, स्टार्ट-अप्स और MSMEs के आत्मनिर्भर रक्षा क्षेत्र के संकल्प का प्रमाण है।

उन्होंने कहा कि रिकॉर्ड रक्षा उत्पादन और निर्यात के आंकड़े ‘नए भारत’ के उदय का प्रमाण हैं, जो अपनी क्षमताओं को मजबूत कर राष्ट्रीय हितों की रक्षा करता है। “यह नया भारत किसी पर बुरी नजर नहीं डालता, लेकिन अपनी संप्रभुता को खतरा पहुंचाने वालों को नजरअंदाज भी नहीं करता,” उन्होंने जोड़ा।

तकनीक के तेजी से बदलते स्वरूप पर जोर देते हुए उन्होंने उद्योगों से नवाचार करने और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच तकनीकी रूप से आगे रहने का आह्वान किया। उन्होंने रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए सरकार की पहलों का उल्लेख किया और उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के प्रभाव की सराहना की।

इस अवसर पर सेंट्रल कमांड के जीओसी-इन-सी लेफ्टिनेंट जनरल अनिंद्य सेनगुप्ता ने उद्योगों से उभरते क्षेत्रों में सेना की जरूरतों को पूरा करने के लिए सहयोग करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भरता से रणनीतिक स्वायत्तता, तकनीकी संप्रभुता और परिचालन दक्षता बढ़ेगी।

तीन दिवसीय नॉर्थ टेक संगोष्ठी 2026 का आयोजन भारतीय सेना के नॉर्दर्न और सेंट्रल कमांड तथा SIDM द्वारा ‘रक्षा त्रिवेणी संगम - जहां तकनीक, उद्योग और सैनिक एक साथ आते हैं’ थीम पर किया गया है। इस कार्यक्रम का उद्घाटन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 4 मई 2026 को किया। इसमें 284 स्टॉल लगे हैं, जहां निजी रक्षा निर्माता अत्याधुनिक तकनीकों का प्रदर्शन कर रहे हैं।

कार्यक्रम में UAVs, ड्रोन, काउंटर-UAV, ऑल टेरेन व्हीकल्स, निगरानी उपकरण और अन्य रक्षा उत्पादों के प्रदर्शन भी शामिल हैं।

इस दौरान नॉर्दर्न कमांड के जीओसी-इन-सी लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा, 1 कोर के जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल वी हरिहरन, SIDM के अध्यक्ष अरुण टी रामचंदानी सहित उद्योग जगत, स्टार्ट-अप्स और अकादमिक क्षेत्र के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

डीआरडीओ ने सॉलिड फ्यूल डक्टेड रैमजेट (SFDR) तकनीक का सफल प्रदर्शन किया

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रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने 03 फरवरी, 2026 को लगभग 10:45 बजे ओडिशा तट के पास चांदीपुर स्थित एकीकृत परीक्षण रेंज (ITR) से सॉलिड फ्यूल डक्टेड रैमजेट (SFDR) तकनीक का सफल प्रदर्शन किया। इस सफलता के साथ भारत उन चुनिंदा देशों के विशिष्ट समूह में शामिल हो गया है, जिनके पास यह अत्याधुनिक तकनीक उपलब्ध है। यह तकनीक लंबी दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइलों के विकास में सक्षम बनाती है, जिससे भारत को अपने प्रतिद्वंद्वियों पर महत्वपूर्ण सामरिक बढ़त प्राप्त होगी।

इस परीक्षण के दौरान सभी उप-प्रणालियों ने अपेक्षा के अनुरूप प्रदर्शन किया। ग्राउंड बूस्टर मोटर द्वारा प्रणाली को वांछित मैक संख्या तक पहुँचाने के बाद नोज़ल-रहित बूस्टर, सॉलिड फ्यूल डक्टेड रैमजेट मोटर तथा फ्यूल फ्लो कंट्रोलर ने सफलतापूर्वक कार्य किया। प्रणाली के प्रदर्शन की पुष्टि उड़ान के दौरान प्राप्त डेटा के माध्यम से की गई, जिसे बंगाल की खाड़ी के तट पर चांदीपुर ITR द्वारा तैनात अनेक ट्रैकिंग उपकरणों ने रिकॉर्ड किया।

इस प्रक्षेपण की निगरानी डीआरडीओ की विभिन्न प्रयोगशालाओं के वरिष्ठ वैज्ञानिकों द्वारा की गई, जिनमें डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबोरेटरी (DRDL), हाई एनर्जी मटीरियल्स रिसर्च लेबोरेटरी (HEMRL), रिसर्च सेंटर इमारत (RCI) तथा ITR, चांदीपुर शामिल हैं।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने SFDR तकनीक के सफल प्रदर्शन पर डीआरडीओ और उद्योग जगत को बधाई दी।
वहीं, रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव एवं डीआरडीओ के अध्यक्ष डॉ. समीर वी. कामत ने भी इस सफल उड़ान परीक्षण में शामिल सभी टीमों को शुभकामनाएँ दीं।


डीआरडीओ ने फाइटर एयरक्राफ्ट एस्केप सिस्टम का हाई-स्पीड रॉकेट-स्लेड परीक्षण सफलतापूर्वक किया

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रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने नियंत्रित वेग पर फाइटर विमान के एस्केप सिस्टम का सफल हाई-स्पीड रॉकेट-स्लेड परीक्षण किया है। चंडीगढ़ स्थित टर्मिनल बैलिस्टिक्स रिसर्च लेबोरेटरी (TBRL) के रेल ट्रैक रॉकेट स्लेड (RTRS) सुविधा में किए गए इस परीक्षण ने कैनोपी सेवरेंस, इजेक्शन सीक्वेंसिंग और एयरक्रू रिकवरी को सफलतापूर्वक प्रमाणित किया।

यह परीक्षण एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के सहयोग से किया गया। यह जटिल डायनामिक परीक्षण भारत को उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में शामिल करता है, जिनके पास उन्नत इन-हाउस एस्केप सिस्टम परीक्षण क्षमता मौजूद है।

स्टैटिक परीक्षणों—जैसे नेट टेस्ट या ज़ीरो-ज़ीरो टेस्ट—की तुलना में डायनामिक इजेक्शन टेस्ट अधिक जटिल होते हैं और इजेक्शन सीट की कार्यक्षमता व कैनोपी सेवरेंस सिस्टम की प्रभावशीलता का वास्तविक मूल्यांकन करते हैं।

परीक्षण में LCA विमान के फोरबॉडी के साथ एक डुअल-स्लेड सिस्टम को ठोस प्रणोदक रॉकेट मोटरों के चरणबद्ध प्रज्वलन से नियंत्रित गति तक पहुंचाया गया।

इजेक्शन प्रक्रिया के दौरान प्रयुक्त एंथ्रोपोमोर्फिक टेस्ट डमी ने पायलट द्वारा अनुभव किए जाने वाले महत्वपूर्ण लोड, मोमेंट और एक्सेलेरेशन को रिकॉर्ड किया। पूरे इजेक्शन अनुक्रम को ऑनबोर्ड और ग्राउंड-बेस्ड इमेजिंग सिस्टम्स ने कैप्चर किया। परीक्षण को भारतीय वायुसेना (IAF) और इंस्टीट्यूट ऑफ एयरोस्पेस मेडिसिन के अधिकारियों ने प्रत्यक्ष रूप से देखा।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने DRDO, IAF, ADA, HAL और उद्योग जगत को इस महत्वपूर्ण उपलब्धि पर बधाई दी और इसे आत्मनिर्भरता की दिशा में भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमता का एक बड़ा मील का पत्थर बताया।

रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव और DRDO अध्यक्ष डॉ. समीर वी. कामत ने भी इस सफल प्रदर्शन से जुड़े DRDO वैज्ञानिकों व टीम की सराहना की।

स्वावलंबन 2025: भारतीय नौसेना की नवाचार और स्वदेशीकरण पहलें उजागर

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नई दिल्ली में 20 नवंबर 2025 को भारतीय नौसेना के Naval Innovation and Indigenisation Organisation (NIIO) द्वारा आयोजित स्वावलंबन 2025 के चौथे संस्करण के लिए Curtain Raiser प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया। इस अवसर पर वीस एडमिरल संजय वत्सयान, उप नौसेना प्रमुख (Vice Chief of Naval Staff) की अध्यक्षता में कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।

मुख्य बिंदु:

  1. स्वावलंबन 2025 का उद्देश्य और थीम:

    • आयोजन 25 से 26 नवंबर 2025 तक मनेकशॉ सेंटर, दिल्ली में होगा।

    • इस वर्ष की थीम: ‘Strength and Power through Innovation and Indigenisation’।

    • उद्देश्य: भारतीय नौसेना में नवाचार और स्वदेशीकरण को बढ़ावा देना और भारतीय उद्योग की भूमिका को उजागर करना।

    • प्रमुख ध्यान emerging और disruptive technologies पर होगा, जो देश की बदलती सुरक्षा आवश्यकताओं के अनुरूप हों।

  2. कार्यक्रम की विशेषताएँ:

    • Dedicated Exhibit Zones: सफल तकनीकी उत्पादों और ‘ideation to induction’ प्रक्रिया से विकसित तकनीकों को प्रदर्शित किया जाएगा।

    • Brainstorming Sessions: नीति निर्माण और स्वदेशी तकनीकों के त्वरित अपनाने पर विचार-विमर्श।

    • Expert Panels: उभरती तकनीकों, disruptive trends और उनकी समुद्री सुरक्षा में प्रासंगिकता पर चर्चा।

    • Interactive Session with Venture Capitalists: नवाचार को फंडिंग, स्केलिंग और समर्थन देने के अवसरों की खोज।

  3. इस वर्ष के विशेष कार्यक्रम:

    • Innovathon का शुभारंभ।

    • Compendium of Technology Challenges and Problem Statements का विमोचन।

    • Swavlamban 4.0 Document और Armament Indigenisation Compendium का अनावरण।

  4. लक्ष्य:

    • नवाचारकर्ताओं, उद्योग भागीदारों, अकादमिक संस्थानों, MSMEs और स्टार्ट-अप्स को एक मंच पर लाना।

    • सहयोग, विचार-विमर्श और भविष्य की नौसैनिक क्षमता विकास में योगदान को प्रोत्साहित करना।

स्वावलंबन 2025 भारतीय नौसेना की तकनीकी आत्मनिर्भरता और नवाचार में अग्रणी प्रयासों को प्रदर्शित करने का महत्वपूर्ण मंच साबित होगा।

भारत को तकनीकी सृजनकर्ता बनाने के लिए नवाचार और सहयोग आवश्यक: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह

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भारत को प्रौद्योगिकी के उपभोक्ता से सृजनकर्ता (consumer to creator) के रूप में परिवर्तित करने के लिए, रक्षा मंत्रीराजनाथ सिंह ने इस बात पर बल दिया कि हमें केवल नई तकनीकों को अपनाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि ऐसे वातावरण का निर्माण करना चाहिए जहाँ नवाचार (innovation) पनप सकें — इसके लिए मजबूत प्रक्रियाएँ, चुस्त संस्थान (agile institutions) और सहयोग की भावना (spirit of collaboration) आवश्यक हैं, जो सैनिक, वैज्ञानिक, स्टार्टअप और रणनीतिकार सभी को एकजुट करे। वे 11 नवम्बर 2025 को नई दिल्ली में आयोजित दिल्ली डिफेंस डायलॉग के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। यह संवाद मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस (MP-IDSA) द्वारा आयोजित किया गया था, जिसका विषय था — “रक्षा क्षमता विकास के लिए नई पीढ़ी की तकनीकों का उपयोग”।

रक्षा मंत्री ने कहा कि हमें ऐसे सिस्टम और पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystems) बनाने होंगे जो नई तकनीकों के निर्माण और अपनाने (creation and adoption) को स्वाभाविक, तेज़ और आत्मनिर्भर बना दें। उन्होंने कहा,

“यदि हमारी नींव मजबूत है, हमारे संस्थान चुस्त हैं, हमारे विचार खुले हैं और हमारा सहयोग निरंतर है, तो हर नई तकनीकी लहर हमें डुबोएगी नहीं, बल्कि आगे बढ़ाएगी। हम केवल दूसरों की बनाई तकनीकी क्रांतियों के अनुयायी नहीं बनेंगे, बल्कि भारत में जन्मी नई क्रांतियों के निर्माता बनेंगे।”

राजनाथ सिंह ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), मशीन लर्निंग (ML), क्वांटम कंप्यूटिंग और स्वॉर्म टेक्नोलॉजी जैसी विघटनकारी तकनीकों (disruptive technologies) को अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि तकनीकी प्रगति का असली पैमाना इस बात से तय होता है कि संपूर्ण रक्षा तंत्र (apparatus) कितनी प्रभावी ढंग से कार्य करता है।

उन्होंने कहा, “तकनीक की शक्ति केवल उपकरणों या एल्गोरिद्म में नहीं है, बल्कि उसमें है कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा में योगदान देने वाली हर प्रक्रिया, हर निर्णय, हर प्रणाली को कैसे नया आकार देती है।”

उन्होंने कहा कि तेज़ डेटा लिंक, AI एल्गोरिद्म, क्वांटम कंप्यूटिंग या स्वायत्त प्रणालियाँ (autonomous systems) तभी उपयोगी हैं जब हमारे आंतरिक प्रक्रियाएँ और मानव व संस्थागत क्षमता उन्हें शीघ्रता से आत्मसात करने में सक्षम हों। उन्होंने यह भी कहा कि रक्षा तत्परता का एक बड़ा हिस्सा उन “अदृश्य तकनीकों” पर निर्भर है — जैसे सुरक्षित डेटा आर्किटेक्चर, एन्क्रिप्टेड नेटवर्क, स्वचालित मेंटेनेंस सिस्टम, और इंटरऑपरेबल डाटाबेस।

राजनाथ सिंह ने बताया कि सरकार के प्रयासों से आज भारत का रक्षा औद्योगिक आधार (defence industrial base) नए आत्मविश्वास और स्पष्टता के साथ आगे बढ़ रहा है। डीआरडीओ, सशस्त्र बलों, उद्योग और अकादमिक जगत के बीच तालमेल ने अनुसंधान, परीक्षण, फीडबैक और नवाचार का एक सकारात्मक चक्र (virtuous cycle) बनाया है। उन्होंने कहा कि भारत अब केवल वैश्विक नवाचारों की बराबरी से संतुष्ट नहीं रह सकता — हमें तेज़ी और सहयोग के साथ नवाचार की संस्कृति को लगातार पोषित करना होगा।

उन्होंने कहा, “तकनीकी नेतृत्व अलग-अलग प्रतिभाओं से नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय पारिस्थितिकी तंत्र (national ecosystem) से उभरता है, जो विचारों को प्रोत्साहित करता है, विफलताओं को स्वीकार करता है और उपलब्धियों का जश्न मनाता है।”

रक्षा मंत्री ने iDEX (Innovations for Defence Excellence) और TDF (Technology Development Fund) जैसी पहलों का विशेष उल्लेख किया, जो नई पीढ़ी के नवोन्मेषकों को प्रोत्साहित कर रही हैं। उन्होंने कहा,

“ये वही युवा नवोन्मेषक हैं जो एक ऐसे भविष्य के निर्माता हैं जहाँ स्वायत्त प्रणालियाँ, क्वांटम सेंसर, उन्नत सामग्रियाँ और अंतरिक्ष-आधारित निगरानी प्रणालियाँ भारतीय प्रतिभा की पहचान बनेंगी।”

उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भरता (Aatmanirbharta) को केवल निर्माण तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि डिजिटल संप्रभुता (digital sovereignty) तक विस्तार करना चाहिए — अर्थात् उन एल्गोरिद्म, डेटा और चिप्स पर नियंत्रण जो हमारे प्लेटफॉर्म को संचालित करते हैं। उन्होंने कहा,

“सच्ची सामरिक स्वायत्तता तभी संभव होगी जब हमारा कोड उतना ही स्वदेशी होगा जितना हमारा हार्डवेयर।”

उन्होंने कहा कि सरकार सुरक्षित स्वदेशी सॉफ्टवेयर स्टैक्स, विश्वसनीय सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन और भारतीय डेटा पर प्रशिक्षित घरेलू AI मॉडल्स को प्रोत्साहित कर रही है। उन्होंने यह भी कहा कि तकनीक मानव निर्णय की जगह नहीं ले सकती, बल्कि उसे सशक्त (amplify) करती है, इसलिए हमें उभरती तकनीकों के नैतिक, मनोवैज्ञानिक और कानूनी आयामों पर भी निवेश करना होगा।

उन्होंने कहा, “भारत, एक सभ्यतागत शक्ति (civilisational power) के रूप में, जिम्मेदार और मानवीय सैन्य तकनीक के उपयोग पर वैश्विक संवाद का नेतृत्व कर सकता है और करना चाहिए।”

रक्षा मंत्री ने कहा कि तकनीक को केवल बल गुणक (force multiplier) ही नहीं, बल्कि संसाधन अनुकूलक (resource optimiser) के रूप में भी देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पूंजीगत खरीद प्रक्रियाओं (capital procurement process) में तकनीक और डेटा एनालिटिक्स का उपयोग कर निर्णय-निर्माण को बेहतर और संसाधनों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित किया जा सकता है।

उन्होंने बताया कि उन्होंने हाल ही में निर्देश दिया है कि हर खरीद प्रस्ताव के आरंभिक चरण में ही लाइफ-साइकिल लागत (life-cycle cost) का मूल्यांकन किया जाए ताकि निवेश का पूर्ण चित्र सामने आ सके — “हम केवल आज के निवेश को नहीं, बल्कि भविष्य की स्थिरता को भी देख सकें।”

राजनाथ सिंह ने सशस्त्र बलों से आग्रह किया कि वे केवल उपकरणों से संबंधित तकनीकों में ही नहीं, बल्कि प्रशिक्षण, लॉजिस्टिक्स, योजना और प्रबंधन प्रणालियों में भी विश्व की सर्वश्रेष्ठ प्रथाओं को अपनाने पर ध्यान दें। उन्होंने कहा,

“श्रेष्ठ उपकरणों की तुलना में श्रेष्ठ प्रक्रियाओं का आयात अधिक उपयोगी है। जब हमारी प्रणालियाँ मजबूत, अनुकूलनीय और पारदर्शी होंगी, तो हमें उत्कृष्टता विदेश से खरीदनी नहीं पड़ेगी — हम उसे यहीं भारत में बना सकेंगे।”

उन्होंने कहा कि एमपी-आईडीएसए (MP-IDSA) इस दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं का अध्ययन कर उन्हें भारत की आवश्यकताओं के अनुरूप ढालने में सहायता कर सकता है।

अपने भाषण की शुरुआत में रक्षा मंत्री ने 10 नवम्बर 2025 को दिल्ली में हुई दुखद दुर्घटना में मारे गए लोगों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की। उन्होंने कहा कि देश की प्रमुख जाँच एजेंसियाँ इस घटना की गहन और त्वरित जाँच कर रही हैं और जल्द ही परिणाम सार्वजनिक किए जाएंगे। उन्होंने आश्वासन दिया कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा और उन्हें न्याय के कठघरे में लाया जाएगा।

इस अवसर पर चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान, डीजी एमपी-आईडीएसए राजदूत सुजन चिनॉय, मित्र देशों के राजदूत तथा वरिष्ठ नागरिक एवं सैन्य अधिकारी उपस्थित थे।

तकनीकी श्रेष्ठता ही आधुनिक युद्ध में सफलता की कुंजी: सीडीएस जनरल अनिल चौहान

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“ऑपरेशन सिंदूर आधुनिक युद्ध का एक सशक्त उदाहरण है, जिसमें प्रिसिशन स्ट्राइक क्षमताओं, नेटवर्क-केंद्रित अभियानों, डिजिटाइज्ड इंटेलिजेंस और मल्टी-डोमेन रणनीतियों का सीमित समय में प्रभावी उपयोग किया गया,” यह बात चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान ने 11 नवम्बर 2025 को नई दिल्ली में आयोजित दिल्ली डिफेंस डायलॉग में “आधुनिक युद्ध पर तकनीक का प्रभाव” विषय पर अपने विशेष संबोधन में कही।

जनरल चौहान ने कहा कि सैन्य नेतृत्व के लिए बदलती परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को तेजी से ढालना अनिवार्य है, क्योंकि आज के दौर में तकनीकी श्रेष्ठता ही युद्धक्षेत्र में सफलता का निर्णायक तत्व बन गई है।

उन्होंने जोर देकर कहा कि युद्ध का मूल उद्देश्य हमेशा विजय प्राप्त करना ही होता है, और जो तकनीक में आगे होंगे, वही अंततः विजेता बनेंगे। उन्होंने बताया कि नई उभरती तकनीकों, बदलते सैन्य सिद्धांतों और भूराजनीतिक परिस्थितियों ने आधुनिक युद्ध के स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया है। आज युद्ध की दिशा तेजी से हो रहे नवाचारों, रणनीतिक साझेदारियों, और संगठनात्मक परिवर्तन से निर्धारित हो रही है।

दो दिवसीय यह आयोजन मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस (MP-IDSA) द्वारा “रक्षा क्षमता विकास के लिए नई युग की तकनीकों का उपयोग” विषय पर आयोजित किया गया। कार्यक्रम का उद्घाटन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने किया।

अपने स्वागत संबोधन में एमपी-आईडीएसए के महानिदेशक (DG) राजदूत सुजन चिनॉय ने इस अवसर के विशेष महत्व पर प्रकाश डाला, क्योंकि यह संस्थान के 60वें स्थापना दिवस के साथ भी मेल खाता है। उन्होंने कहा कि आधुनिक रक्षा क्षमताओं को आकार देने में तकनीक की भूमिका परिवर्तनकारी रही है और दुनिया भर की सशस्त्र सेनाएँ अब औद्योगिक युग से सूचना एवं साइबर युग की ओर बढ़ रही हैं।

राजदूत चिनॉय ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence), रोबोटिक्स, और क्वांटम फिजिक्स जैसी उभरती तकनीकें अब युद्ध और सुरक्षा के प्रमुख निर्धारक बनती जा रही हैं। उन्होंने विदेशी तकनीक के अधिग्रहण और स्वदेशी रक्षा निर्माण के बीच संतुलन बनाए रखने पर बल दिया तथा ‘आत्मनिर्भरता’ (Aatmanirbharta) की नीति के अंतर्गत स्वदेशी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।



यह संवाद नीति-निर्माताओं, शोधकर्ताओं, उद्योग जगत और शिक्षाविदों को एक मंच पर लाता है ताकि वे यह साझा कर सकें कि नई पीढ़ी की तकनीकों का उपयोग भारत की रक्षा क्षमताओं को और कैसे सशक्त बना सकता है।

इन चर्चाओं से डेटा-आधारित रक्षा प्रणालियों के विकास और भविष्य की सुरक्षा तकनीकों को दिशा देने में महत्वपूर्ण योगदान मिलने की उम्मीद है।

डीआरडीओ नई दिल्ली में आयोजित ‘उदीयमान विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार सम्मेलन (ESTIC) 2025’ में भाग ले रहा है

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रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) नई दिल्ली के भारत मंडपम में 3 से 5 नवंबर, 2025 तक आयोजित हो रहे Emerging Science, Technology and Innovation Conclave (ESTIC) 2025 में भाग ले रहा है। इस वर्ष सम्मेलन का विषय है – ‘विकसित भारत 2047: सतत नवाचार, तकनीकी प्रगति और सशक्तिकरण का मार्गदर्शन’, जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 3 नवंबर, 2025 को किया। यह सम्मेलन भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के मार्गदर्शन में 13 मंत्रालयों एवं विभागों के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया जा रहा है।

उद्घाटन सत्र में प्रधानमंत्री ने ₹1 लाख करोड़ अनुसंधान, विकास और नवाचार योजना कोष (RDI Scheme Fund) का शुभारंभ किया, जिसका उद्देश्य निजी क्षेत्र आधारित अनुसंधान एवं नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ बनाना और भारत को वैश्विक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी केंद्र के रूप में विकसित करना है। प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर यह भी कहा कि सरकार निजी क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास को प्रोत्साहित करने के लिए लगातार प्रयासरत है।

सम्मेलन में अग्रणी वैज्ञानिकों के व्याख्यान, पैनल चर्चाएँ, प्रस्तुतियाँ और प्रौद्योगिकी प्रदर्शनी आयोजित की जा रही हैं, जिनका उद्देश्य शोधकर्ताओं, उद्योग जगत और युवा नवोन्मेषकों के बीच सहयोग को सशक्त बनाना और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र को और मजबूत करना है।

मुख्य आयोजकों में से एक के रूप में DRDO ‘इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर विनिर्माण’ पर थीमैटिक सत्र का नेतृत्व कर रहा है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव एवं DRDO अध्यक्ष डॉ. समीर वी. कामत 5 नवंबर, 2025 को इस विषय पर तकनीकी सत्र की अध्यक्षता करेंगे।

सेमीकंडक्टर आधुनिक तकनीकी पारिस्थितिकियों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जो स्वास्थ्य सेवा, संचार, परिवहन, रक्षा और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में प्रमुख प्रणालियों को संचालित करते हैं। DRDO ने सेमीकंडक्टर प्रौद्योगिकी में उल्लेखनीय प्रगति की है, जिसमें 4-इंच सिलिकॉन कार्बाइड वेफर्स के स्वदेशी उत्पादन और गैलियम नाइट्राइड हाई इलेक्ट्रॉन मोबिलिटी ट्रांजिस्टर (HEMT) को 150 वॉट तक निर्मित करने की क्षमता शामिल है।

पैनल चर्चाओं में भाग लेने वाले अन्य DRDO अधिकारियों में विशिष्ट वैज्ञानिक एवं महानिदेशक (माइक्रो इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेज, कम्प्यूटेशनल सिस्टम्स एवं साइबर सिस्टम्स) श्रीमती सुमा वरुघीस, डिफेंस मेटालर्जिकल रिसर्च लेबोरेटरी, हैदराबाद के निदेशक डॉ. रामलिंगम बालामुरलीकृष्णन, और सॉलिड स्टेट फिजिक्स लेबोरेटरी, दिल्ली की वैज्ञानिक-जी डॉ. सोमन महाजन शामिल हैं।

ESTIC 2025 में शिक्षाविदों, अनुसंधान संस्थानों, उद्योग और सरकार से जुड़े 3,000 से अधिक प्रतिभागी शामिल हो रहे हैं, जिनमें नोबेल पुरस्कार विजेता, प्रतिष्ठित वैज्ञानिक, नवप्रवर्तक और नीति निर्माता भी सम्मिलित हैं। सम्मेलन में 11 प्रमुख क्षेत्रों पर चर्चा हो रही है, जिनमें उन्नत सामग्री और विनिर्माण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, बायो-निर्माण, ब्लू इकोनॉमी, डिजिटल संचार, इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर विनिर्माण, उभरती कृषि प्रौद्योगिकियाँ, ऊर्जा, पर्यावरण और जलवायु, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा प्रौद्योगिकी, क्वांटम विज्ञान और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियाँ शामिल हैं।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने लखनऊ में टाइटेनियम और सुपरएलॉय मटीरियल्स प्लांट का उद्घाटन कर भारत की तकनीकी संप्रभुता को मजबूत करने का दिया संदेश

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रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 18 अक्टूबर 2025 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ में PTC इंडस्ट्रीज के स्ट्रैटेजिक मटीरियल्स टेक्नोलॉजी कॉम्प्लेक्स का उद्घाटन करते हुए कहा कि “भारत को रक्षा और एयरोस्पेस में उपयोग होने वाली दुर्लभ सामग्रियों का उत्पादन करना चाहिए, ताकि यह तकनीकी निर्माता बन सके और अपनी तकनीकी संप्रभुता की रक्षा कर सके।”

उन्होंने कहा कि दुर्लभ पृथ्वी सामग्री (Rare Earth Materials) का उपयोग रक्षा, अंतरिक्ष, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य क्षेत्रों में होता है, और केवल कुछ देशों के पास इन सामग्रियों को परिष्कृत कर उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद बनाने की क्षमता है। इस संदर्भ में, इस संयंत्र का उद्घाटन, जो एरो-इंजन कंपोनेंट्स और सुपर एलॉय कंपोनेंट्स जैसे उत्पाद बनाने वाला पहला निजी क्षेत्र का संयंत्र है, भारत को दुर्लभ सामग्रियों का उत्पादन करने में मदद करेगा।

रक्षा मंत्री ने उल्लेख किया कि अतीत में भारत रक्षा और एयरोस्पेस के लिए आवश्यक उन्नत सामग्रियों और तकनीकों के लिए अन्य देशों पर निर्भर था, जिससे रक्षा क्षेत्र की वृद्धि धीमी पड़ गई थी। इस तरह की पहलें इस प्रवृत्ति को बदलने का संकेत देती हैं।

राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत को वास्तविक शक्ति तभी प्राप्त होगी जब वह अपनी सामग्रियां, कंपोनेंट्स, चिप्स और एलॉय खुद बना सके। उन्होंने कहा कि यह नया संयंत्र भारत को उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल करता है जो अपने महत्वपूर्ण रक्षा और एयरोस्पेस सामग्री का उत्पादन कर सकते हैं। “इसके साथ हम अपने फाइटर जेट, मिसाइल, नौसैनिक प्रणाली और उपग्रहों में इस्तेमाल होने वाले पार्ट्स का निर्माण कर पाएंगे।”


रक्षा मंत्री ने कहा कि तकनीक शक्ति है, लेकिन सामग्री असली ताकत है। चाहे वह सेमीकंडक्टर चिप हो, बुलेट सामग्री हो या इंजन टरबाइन पार्ट, ये सब रणनीतिक सामग्रियों के बिना संभव नहीं हैं। उन्होंने कहा, “हम ऐसा आधार बना रहे हैं जो आने वाले वर्षों में भारत की तकनीकी संप्रभुता को मजबूत करेगा।”

राजनाथ सिंह ने इस संयंत्र को आत्मनिर्भर भारत का जीवंत उदाहरण बताते हुए कहा कि यह न केवल उद्योग बल्कि समाज के लिए भी लाभकारी होगा। यह एक इनोवेशन चेन स्थापित करता है, जो रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को पूरा करेगा और राज्य की अर्थव्यवस्था को नई गति देगा।

स्ट्रैटेजिक मटीरियल्स टेक्नोलॉजी कॉम्प्लेक्स पर रक्षा मंत्री ने कहा कि यह यूपी के औद्योगिक मानचित्र में एक नई दिशा जोड़ता है। इस कॉम्प्लेक्स के साथ जुड़ी सहायक इकाइयां और आपूर्ति उद्योग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा करेंगे। उन्होंने कहा कि UP Defence Industrial Corridor एशिया के सबसे उन्नत निर्माण क्षेत्रों में से एक होगा, जो कई स्टार्ट-अप और MSME से जुड़ा होगा, जिससे युवाओं को प्रशिक्षण और तकनीकी अनुभव के अवसर मिलेंगे।

रक्षा मंत्री ने यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रशंसा करते हुए कहा कि राज्य ने पिछले 10 वर्षों में औद्योगिक क्रांति में अग्रणी भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि बेहतर कानून और व्यवस्था ने निवेशक विश्वास बढ़ाया है और राज्य में फैक्ट्री, IT हब और अनुसंधान केंद्र स्थापित हो रहे हैं, जिससे यूपी देश की विकास इंजन बन गया है।

उन्होंने कहा, “हम एक नए युग में प्रवेश कर रहे हैं और अब Make-in-India से आगे बढ़कर Design, Develop और Deliver in India की दिशा में काम कर रहे हैं।” उन्होंने निजी क्षेत्र की भूमिका को भी सराहा और कहा कि यदि सरकार और उद्योग मिलकर काम करें, तो कोई भी लक्ष्य संभव है।

रक्षा मंत्री ने युवा, नवप्रवर्तक, MSME और स्टार्ट-अप से अपील की कि वे रक्षा क्षेत्र में अवसरों का लाभ केवल व्यवसाय के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्र की जिम्मेदारी के रूप में लें। उन्होंने कहा कि आज का काम नई पीढ़ी के नवप्रवर्तकों को प्रेरित करेगा।

उद्घाटन समारोह में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ यूपी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक, रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव और DRDO के अध्यक्ष डॉ. समीर वी कामत और DG (BrahMos) डॉ. जयतीर्थ आर जोशी उपस्थित थे। PTC इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक सचिन अग्रवाल ने संयंत्र की सुविधाओं की जानकारी दी।

इस अवसर पर PTC इंडस्ट्रीज लिमिटेड और भारत डायनामिक्स लिमिटेड (BDL) के बीच एक संयुक्त उद्यम (JV) समझौते पर हस्ताक्षर किए गए, जिसका उद्देश्य प्रोपल्शन सिस्टम, गाइडेड बम और छोटे एयरोइंजन का डिजाइन, विकास और निर्माण करना है। इस सहयोग का लक्ष्य उन्नत प्रोपल्शन तकनीकों का स्वदेशीकरण करना और रक्षा उत्पादन आधार को मजबूत करना है।

साथ ही, CEMILAC, DRDO ने PTC इंडस्ट्रीज को एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) के लिए टाइटेनियम रियर फिन रूट कास्टिंग और Kaveri Derivative Engine (KDE-2) के लिए ऑइल टैंक असेंबली टाइटेनियम कास्टिंग के लोअ (Letter of Technical Acceptance) जारी किए। इसके साथ GTRE के सहयोग से सिंगल क्रिस्टल ‘रेडी-टू-फिट’ टरबाइन ब्लेड्स का निर्माण भी किया जाएगा, जो आधुनिक जेट इंजनों के सबसे जटिल और मूल्यवान घटकों में से एक हैं।

50 एकड़ क्षेत्र में फैले इस स्ट्रैटेजिक मटीरियल्स टेक्नोलॉजी कॉम्प्लेक्स में 1,000 करोड़ रुपये का निवेश किया गया है। इस संयंत्र की सालाना उत्पादन क्षमता 6,000 टन से अधिक है, जो घरेलू और पुनर्नवीनीकृत स्रोतों से एविशन-ग्रेड टाइटेनियम और सुपरएलॉय का उत्पादन करने में सक्षम है। यह भारत की रणनीतिक सामग्रियों में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक निर्णायक कदम है।

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