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रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जारी किया DRDO का नया वित्तीय अधिकार ढांचा (DFP-2026), रक्षा अनुसंधान को मिलेगी नई गति

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नई दिल्ली- रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 29 जून 2026 को रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के लिए डेलीगेशन ऑफ फाइनेंशियल पावर्स-2026 (DFP-2026) जारी किया। यह नया वित्तीय ढांचा रक्षा अनुसंधान एवं विकास परियोजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण सुधार माना जा रहा है।

प्रमुख बातें

  • DFP-2026 से रक्षा अनुसंधान परियोजनाओं को समय पर मंजूरी और वित्तीय स्वीकृति मिलेगी।

  • रक्षा तकनीकों, हथियार प्रणालियों और प्लेटफॉर्म्स का तेजी से उत्पादन और सेना में शामिल किया जा सकेगा।

  • उद्योग, स्टार्टअप और शैक्षणिक संस्थानों के साथ साझेदारी को बढ़ावा मिलेगा।

  • यह पहल आत्मनिर्भर भारत अभियान को मजबूत करेगी और स्वदेशी रक्षा तकनीकों के विकास में तेजी लाएगी।

नए ढांचे की विशेषताएं

  • परीक्षण, ट्रायल और मूल्यांकन गतिविधियों के लिए अलग वित्तीय प्रावधान।

  • परियोजना शुरू होने से पहले अनुसंधान एवं विकास (Pre-Project R&D) को मंजूरी देने का अधिकार।

  • Extra-Mural Research Projects, Defence Innovation Accelerator – Centres of Excellence तथा Technology Development Fund परियोजनाओं के लिए अलग-अलग वित्तीय अधिकार निर्धारित किए गए हैं।

  • DRDO के विभिन्न स्तरों पर अधिकारियों को अधिक वित्तीय अधिकार देकर निर्णय प्रक्रिया को तेज बनाया जाएगा।

रक्षा मंत्री ने क्या कहा?

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि नया वित्तीय ढांचा रक्षा अनुसंधान को अधिक प्रभावी बनाएगा, उद्योग और अकादमिक संस्थानों के साथ सहयोग बढ़ाएगा तथा देश की रक्षा तैयारियों को और मजबूत करेगा। उन्होंने कहा कि यह सुधार रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को नई गति देगा।

इस अवसर पर चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान, रक्षा सचिव एवं DRDO के अध्यक्ष राजेश कुमार सिंह, रक्षा उत्पादन सचिव संजीव कुमार, पूर्व सैनिक कल्याण सचिव सुकृति लिखी सहित रक्षा मंत्रालय और DRDO के कई वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

आत्मनिर्भर भारत की ओर बढ़ता देश, प्रधानमंत्री ने 'मन की बात' में गिनाईं उपलब्धियां

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नई दिल्ली- प्रधानमंत्री ने अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' में देशवासियों को संबोधित करते हुए कहा कि भारत सुरक्षा, आत्मनिर्भरता, विज्ञान और सामाजिक भागीदारी के क्षेत्र में लगातार नई उपलब्धियां हासिल कर रहा है। उन्होंने स्वदेशी रक्षा उत्पादन, योग, पर्यावरण संरक्षण और जनभागीदारी की सराहना की।

प्रधानमंत्री ने बताया कि भारत में निर्मित C-295 विमान की पहली सफल उड़ान देश के रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्र के लिए बड़ी उपलब्धि है। इसके साथ ही DRDO द्वारा स्वदेशी लॉन्ग-रेंज लैंड-अटैक क्रूज मिसाइल का सफल परीक्षण भारत की रक्षा क्षमता को और मजबूत करेगा।

उन्होंने अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का उल्लेख करते हुए कहा कि इस वर्ष दुनिया भर के 2,500 से अधिक स्थानों पर योग कार्यक्रम आयोजित किए गए। अहमदाबाद में आयोजित विश्व योगासन चैंपियनशिप में भारत ने 114 पदक जीतकर पहला स्थान हासिल किया।

प्रधानमंत्री ने नागरिकों से पर्यावरण संरक्षण और आत्मनिर्भरता के लिए स्थानीय उत्पाद अपनाने की अपील की। उन्होंने आगामी गणेश उत्सव के अवसर पर मिट्टी से बनी स्थानीय कारीगरों की गणेश प्रतिमाएं खरीदने तथा प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) की मूर्तियों से बचने का आग्रह किया।

कार्यक्रम में उन्होंने प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना और प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना का भी उल्लेख करते हुए लोगों से इन योजनाओं का लाभ उठाने और अधिक से अधिक लोगों तक इसकी जानकारी पहुंचाने की अपील की।

अपने संबोधन के अंत में प्रधानमंत्री ने जल संरक्षण, 'कैच द रेन' अभियान और जनभागीदारी को देश की सबसे बड़ी ताकत बताते हुए सभी नागरिकों से इसमें सक्रिय योगदान देने का आह्वान किया।

डीआरडीओ के स्वदेशी ‘नेत्र’ AEW&C सिस्टम को मिली अंतिम परिचालन मंजूरी, भारतीय वायुसेना को सौंपा गया FOC प्रमाणपत्र

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बेंगलुरु- भारत ने रक्षा तकनीक में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। Defence Research and Development Organisation (DRDO) द्वारा विकसित स्वदेशी ‘नेत्र’ एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (AEW&C) सिस्टम को अंतिम परिचालन मंजूरी (Final Operational Clearance - FOC) मिल गई है। इस अवसर पर भारतीय वायुसेना को आधिकारिक रूप से FOC प्रमाणपत्र सौंपा गया।

यह प्रणाली भारतीय वायुसेना, डीआरडीओ और उद्योग जगत के सहयोग से विकसित की गई है। इसका उद्देश्य हवाई निगरानी, युद्धक्षेत्र की वास्तविक समय की जानकारी (Situational Awareness) और बैटल मैनेजमेंट क्षमताओं को मजबूत करना है। इससे भारतीय वायुसेना की परिचालन क्षमता और रणनीतिक दक्षता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

बेंगलुरु में आयोजित समारोह की अध्यक्षता वायुसेना के उप प्रमुख एयर मार्शल अवधेश कुमार भारती ने की। कार्यक्रम में पूर्व वायुसेना प्रमुख आर.के.एस. भदौरिया, पूर्व डीआरडीओ अध्यक्ष डॉ. एस. क्रिस्टोफर, डीआरडीओ और भारतीय वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारी तथा उद्योग जगत के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

अपने संबोधन में एयर मार्शल अवधेश कुमार भारती ने स्वदेशी नेत्र AEW&C सिस्टम की उपलब्धि की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रणाली ने ऑपरेशन सिंदूर और 2019 बालाकोट एयर स्ट्राइक जैसे अभियानों में अपनी विश्वसनीयता और प्रभावशीलता साबित की है। उन्होंने कहा कि स्वदेशी तकनीकें बदलते युद्ध परिदृश्यों के अनुसार आवश्यक संशोधन और उन्नयन की सुविधा प्रदान करती हैं।

डीआरडीओ के एरोनॉटिक्स क्लस्टर की महानिदेशक डॉ. के. राजलक्ष्मी मेनन ने नेत्र परियोजना की विकास यात्रा और सामने आई तकनीकी चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि मजबूत सिस्टम इंजीनियरिंग और सटीक परीक्षण प्रक्रिया ने परियोजना को सफल बनाने में अहम भूमिका निभाई।

इलेक्ट्रॉनिक्स क्लस्टर के महानिदेशक डॉ. बी.के. दास ने कहा कि डीआरडीओ, भारतीय वायुसेना और उद्योग क्षेत्र के बीच उत्कृष्ट तालमेल ही इस परियोजना की सफलता का आधार रहा है। उन्होंने नेत्र AEW&C को आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया।

कार्यक्रम के दौरान परियोजना में योगदान देने वाले विभिन्न संगठनों और इकाइयों को सम्मानित भी किया गया। अधिकारियों ने कहा कि नेत्र AEW&C प्रणाली का सफल परिचालन भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमताओं को नई ऊंचाई प्रदान करेगा और यह वैज्ञानिक संस्थानों, रक्षा उत्पादन इकाइयों तथा सैन्य बलों के बीच मजबूत सहयोग का उत्कृष्ट उदाहरण है।


डीआरडीओ ने लंबी दूरी की भूमि आक्रमण क्रूज़ मिसाइल (LRLACM) का सफल उड़ान परीक्षण किया

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नई दिल्ली- रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने 15 जून 2026 को ओडिशा तट स्थित डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वीप से लॉन्ग रेंज लैंड अटैक क्रूज़ मिसाइल (LRLACM) का सफल उड़ान परीक्षण किया। परीक्षण के सभी निर्धारित उद्देश्यों को पूर्णतः हासिल कर लिया गया। यह पुष्टि चांदीपुर स्थित एकीकृत परीक्षण रेंज (ITR) द्वारा तैनात विभिन्न ट्रैकिंग उपकरणों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर की गई।

एलआरएलएसीएम एक स्वदेशी रूप से विकसित मिसाइल है, जिसके सभी उप-प्रणालियों का विकास डीआरडीओ की विभिन्न प्रयोगशालाओं तथा भारतीय उद्योग साझेदारों द्वारा किया गया है। इस परियोजना की नोडल प्रयोगशाला एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (ADE), बेंगलुरु है।

मिसाइल के प्रक्षेपण के दौरान डीआरडीओ के वरिष्ठ अधिकारी तथा भारतीय नौसेना और भारतीय वायु सेना के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एलआरएलएसीएम के सफल उड़ान परीक्षण पर डीआरडीओ की टीम और उद्योग साझेदारों को बधाई दी। उन्होंने इसे भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता और स्वदेशी रक्षा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया।

रक्षा सचिव, रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग (R&D) के सचिव तथा डीआरडीओ के अध्यक्ष राजेश कुमार सिंह ने प्रक्षेपण के दौरान सभी गतिविधियों की निगरानी की। उन्होंने सफल परीक्षण में योगदान देने वाले सभी वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और टीम सदस्यों को बधाई दी।

यह सफल परीक्षण भारत की लंबी दूरी की सटीक प्रहार क्षमता को और सशक्त बनाने के साथ-साथ रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

भारत की रक्षा शक्ति को बड़ी मजबूती: DRDO के तीन सफल उड़ान परीक्षण

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रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने विभिन्न प्रकार के दुश्मन खतरों के खिलाफ देश की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने वाली कई महत्वपूर्ण तकनीकों का सफल प्रदर्शन किया है। 10 और 11 जून 2026 को लगातार तीन उड़ान परीक्षण (फ्लाइट-टेस्ट) किए गए, जिनके माध्यम से लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों के विरुद्ध बहु-स्तरीय रक्षा तथा मध्यम दूरी की एंटी-शिप क्षमता का प्रदर्शन किया गया।

बहु-स्तरीय बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस (BMD) क्षमता का सफलतापूर्वक प्रदर्शन किया गया। इंटरसेप्टर मिसाइलों ने अपने-अपने लक्ष्यों को सफलतापूर्वक निशाना बनाया। इन प्रणालियों को नवीनतम तकनीकों के साथ विकसित किया गया है ताकि उभरते हुए मिसाइल खतरों का प्रभावी ढंग से मुकाबला किया जा सके।

इन परीक्षणों के साथ भारत उन चुनिंदा देशों के समूह में शामिल हो गया है जिनके पास इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) तक को निष्क्रिय करने में सक्षम BMD प्रणाली उपलब्ध है। इसके अलावा, नेवल एंटी-शिप मिसाइल – मीडियम रेंज (NASM-MR) का पहला उड़ान परीक्षण भी सफलतापूर्वक किया गया। इन परीक्षणों को DRDO और सशस्त्र बलों के वरिष्ठ अधिकारियों ने प्रत्यक्ष रूप से देखा।

राजनाथ सिंह ने इन महत्वपूर्ण तकनीकों के सफल प्रदर्शन के लिए DRDO को बधाई दी।

DRDO के अध्यक्ष एवं रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव राजेश कुमार सिंह ने परीक्षणों की निकटता से निगरानी की और DRDO तथा उद्योग जगत के संयुक्त प्रयासों की सराहना की।

भारत ने एडवांस अग्नि मिसाइल का सफल परीक्षण किया

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भारत ने 8 मई 2026 को ओडिशा स्थित डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टार्गेटेबल री-एंट्री व्हीकल (MIRV) प्रणाली से लैस एडवांस अग्नि मिसाइल का सफल परीक्षण किया।

इस मिसाइल का परीक्षण कई पेलोड्स के साथ किया गया, जिन्हें हिंद महासागर क्षेत्र में अलग-अलग रणनीतिक लक्ष्यों पर सफलतापूर्वक निशाना बनाया गया।

मिसाइल की पूरी उड़ान पर नजर रखने के लिए कई ग्राउंड और जहाज आधारित ट्रैकिंग स्टेशनों का उपयोग किया गया। इन प्रणालियों ने लॉन्च से लेकर सभी पेलोड्स के लक्ष्य पर पहुंचने तक मिसाइल की पूरी ट्रैजेक्टरी को ट्रैक किया। परीक्षण के आंकड़ों से पुष्टि हुई कि मिशन के सभी उद्देश्य सफलतापूर्वक पूरे किए गए।

इस सफल परीक्षण के साथ भारत ने एक बार फिर यह साबित किया कि वह एक ही मिसाइल प्रणाली से कई रणनीतिक लक्ष्यों को निशाना बनाने में सक्षम है। इस अत्याधुनिक मिसाइल का विकास Defence Research and Development Organisation (DRDO) की प्रयोगशालाओं ने देशभर के उद्योगों के सहयोग से किया है।

परीक्षण के दौरान DRDO के वरिष्ठ वैज्ञानिकों और भारतीय सेना के अधिकारियों की उपस्थिति रही।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस सफल परीक्षण के लिए DRDO, भारतीय सेना और उद्योग जगत को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि देश की रक्षा तैयारियों को और मजबूत करेगी तथा बढ़ते सुरक्षा खतरों के बीच भारत की सामरिक क्षमता में महत्वपूर्ण वृद्धि करेगी।

डीआरडीओ और भारतीय वायुसेना ने किया ‘TARA’ हथियार का सफल पहला परीक्षण

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Defence Research and Development Organisation (DRDO) और Indian Air Force (IAF) ने 7 मई 2026 को ओडिशा तट के पास Tactical Advanced Range Augmentation (TARA) हथियार का सफल पहला उड़ान परीक्षण किया।

TARA भारत का पहला स्वदेशी ग्लाइड वेपन सिस्टम है, जो बिना गाइडेड वारहेड्स को अत्याधुनिक प्रिसीजन गाइडेड हथियारों में बदलने की क्षमता रखता है। यह सिस्टम कम लागत में दुश्मन के जमीनी ठिकानों को अधिक सटीकता और ताकत के साथ निशाना बनाने में सक्षम है।

इस अत्याधुनिक प्रणाली को Research Centre Imarat (RCI), हैदराबाद और DRDO की अन्य प्रयोगशालाओं द्वारा विकसित किया गया है। इसमें आधुनिक और कम लागत वाली तकनीकों का उपयोग किया गया है।

TARA परियोजना का निर्माण Development cum Production Partners (DcPP) और कई भारतीय उद्योगों के सहयोग से किया गया है, जिन्होंने इसके उत्पादन की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस सफल परीक्षण पर DRDO, भारतीय वायुसेना और सभी साझेदार उद्योगों को बधाई दी। उन्होंने इसे भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि बताया।

वहीं, रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव और DRDO के चेयरमैन समीर वी कामत ने भी इस सफल उड़ान परीक्षण से जुड़ी पूरी टीम को शुभकामनाएं दीं।


रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने तकनीकी अनुसंधान और ‘सरप्राइज एलिमेंट’ पर दिया जोर

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राजनाथ सिंह ने कहा है कि तेजी से बदलती तकनीक के इस दौर में देश को भविष्य के युद्धों के लिए तैयार रहने हेतु अनुसंधान और ‘सरप्राइज एलिमेंट’ (अचानक रणनीतिक बढ़त) पर लगातार ध्यान देना होगा। वे 4 मई 2026 को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में आयोजित तीन दिवसीय नॉर्थ टेक सिम्पोजियम के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे।


रक्षा मंत्री ने आधुनिक युद्ध की बदलती प्रकृति का उल्लेख करते हुए कहा कि रूस-यूक्रेन संघर्ष में कुछ ही वर्षों में युद्ध टैंक और मिसाइलों से ड्रोन व सेंसर आधारित हो गया है। उन्होंने कहा कि आज सामान्य उपयोग की वस्तुएं भी खतरनाक हथियार बन सकती हैं, जिससे सुरक्षा रणनीतियों पर पुनर्विचार जरूरी हो गया है।

उन्होंने कहा कि युद्ध में जीत उसी की होती है जिसके पास “सरप्राइज” का तत्व होता है। इसलिए भारत को ऐसी क्षमताएं विकसित करनी होंगी, जिससे जरूरत पड़ने पर दुश्मन को चौंकाया जा सके।

रक्षा मंत्री ने कहा कि आज के दौर में अनुसंधान का कोई विकल्प नहीं है और भविष्य के युद्धों की दिशा प्रयोगशालाओं में तय हो रही है। उन्होंने बताया कि सरकार ने रक्षा अनुसंधान को प्राथमिकता देते हुए रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के माध्यम से उद्योग, स्टार्टअप और शिक्षण संस्थानों के साथ मिलकर काम करना शुरू किया है।

उन्होंने जानकारी दी कि रक्षा अनुसंधान एवं विकास (R&D) बजट का 25% उद्योग, स्टार्टअप और अकादमिक क्षेत्र के लिए निर्धारित किया गया है, जिसमें से अब तक 4500 करोड़ रुपये से अधिक का उपयोग किया जा चुका है। साथ ही, नई तकनीक हस्तांतरण नीति के तहत शुल्क में छूट दी गई है और अब तक 2200 से अधिक तकनीकों का हस्तांतरण किया जा चुका है।

रक्षा मंत्री ने उद्योगों से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम टेक्नोलॉजी, हाइपरसोनिक हथियार और स्पेस तकनीक जैसे क्षेत्रों में आगे बढ़ने का आह्वान किया। उन्होंने “ऑपरेशन सिंदूर” का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें स्वदेशी तकनीकों जैसे आकाश मिसाइल और ब्रह्मोस का सफल उपयोग हुआ, जो भारत की सैन्य क्षमता का प्रमाण है।

उन्होंने बताया कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार आत्मनिर्भरता पर जोर दे रही है। देश का रक्षा उत्पादन 2025-26 में 1.54 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जबकि रक्षा निर्यात 38,424 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर है।

इस अवसर पर सेना प्रमुख, वायुसेना अधिकारी, उद्योग प्रतिनिधि और शिक्षाविद भी मौजूद रहे। सिम्पोजियम में 284 कंपनियों ने अपने स्वदेशी तकनीकी समाधान प्रदर्शित किए।

रक्षा मंत्री ने उम्मीद जताई कि यह आयोजन भारत को तकनीकी और सैन्य रूप से और मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।


DRDO और भारतीय नौसेना की बड़ी कामयाबी, एंटी-शिप मिसाइल NASM-SR का सफल परीक्षण

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भारत ने एक बार फिर अपनी रक्षा क्षमता का दम दिखाया है। Defence Research and Development Organisation (DRDO) और Indian Navy ने मिलकर नेवल एंटी-शिप मिसाइल (NASM-SR) का सफल परीक्षण किया है। यह परीक्षण ओडिशा तट के पास बंगाल की खाड़ी में नौसेना के हेलीकॉप्टर से किया गया।

इस परीक्षण की खास बात यह रही कि एक ही हेलीकॉप्टर से दो मिसाइलों को एक साथ (salvo) लॉन्च किया गया, जो भारत के लिए पहली बार है। दोनों मिसाइलों ने अपने लक्ष्य को सटीकता से भेदा और सभी परीक्षण मानकों को पूरी तरह हासिल किया।

अत्याधुनिक तकनीक से लैस मिसाइल

NASM-SR मिसाइल पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से विकसित की गई है। इसमें:

  • उन्नत सीकर और एवियोनिक्स सिस्टम

  • फाइबर-ऑप्टिक आधारित नेविगेशन सिस्टम

  • हाई-बैंडविड्थ टू-वे डेटा लिंक

  • सटीक गाइडेंस और कंट्रोल तकनीक

जैसी आधुनिक सुविधाएं शामिल हैं, जो इसे दुश्मन के जहाजों के खिलाफ बेहद प्रभावी बनाती हैं।

सटीक निशाना और सफल परीक्षण

इस परीक्षण के दौरान मिसाइल ने वॉटरलाइन हिट क्षमता का शानदार प्रदर्शन किया, यानी जहाज के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से पर सटीक वार किया। परीक्षण की निगरानी चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज (ITR) से रडार और अन्य आधुनिक उपकरणों के जरिए की गई।

कई संस्थानों का संयुक्त प्रयास

इस मिसाइल को हैदराबाद स्थित रिसर्च सेंटर इमारत (RCI) सहित DRDO की कई प्रयोगशालाओं और भारतीय उद्योगों के सहयोग से विकसित किया गया है। इससे देश की स्वदेशी रक्षा उत्पादन क्षमता को भी मजबूती मिली है।

रक्षा मंत्री ने दी बधाई

राजनाथ सिंह ने इस उपलब्धि पर DRDO, नौसेना, वायुसेना और सभी संबंधित टीमों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह सफलता भारत की समुद्री सुरक्षा को और सशक्त बनाएगी।

वहीं DRDO प्रमुख समीर वी. कामत ने भी वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की मेहनत की सराहना की।

क्या है महत्व?

यह परीक्षण भारत के लिए एक बड़ा कदम है, जिससे:

  • समुद्री सुरक्षा मजबूत होगी

  • दुश्मन के जहाजों पर सटीक हमला संभव होगा

  • आत्मनिर्भर भारत की दिशा में रक्षा क्षेत्र और मजबूत होगा

कुल मिलाकर, यह सफलता भारत को आधुनिक और शक्तिशाली रक्षा तकनीक वाले देशों की श्रेणी में और मजबूत स्थान दिलाती है।

रक्षा मंत्रालय ने BEL के साथ 1,950 करोड़ रुपये का समझौता किया, स्वदेशी माउंटेन रडार से वायु रक्षा को मिलेगी मजबूती

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आत्मनिर्भर भारत और मेक-इन-इंडिया के तहत भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में रक्षा मंत्रालय (MoD) ने भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) के साथ एक महत्वपूर्ण पूंजीगत खरीद समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। यह समझौता भारतीय वायुसेना के लिए दो माउंटेन रडार, उनसे जुड़े उपकरणों और आवश्यक अवसंरचना की खरीद के लिए लगभग 1,950 करोड़ रुपये की लागत से किया गया है।

यह अनुबंध ‘बाय (इंडियन–इंडिजिनसली डिजाइन, डेवलप्ड एंड मैन्युफैक्चर्ड)’ श्रेणी के अंतर्गत 31 मार्च 2026 को नई दिल्ली में MoD और BEL के वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति में संपन्न हुआ।

यह माउंटेन रडार रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं रडार विकास प्रतिष्ठान द्वारा स्वदेशी रूप से डिजाइन और विकसित किया गया है तथा इसका निर्माण BEL द्वारा किया जाएगा। इन रडारों की स्थापना और कमीशनिंग से देश की वायु रक्षा क्षमता में वृद्धि होगी और राष्ट्रीय सुरक्षा को और मजबूती मिलेगी। साथ ही, इस खरीद से विदेशी उपकरणों पर निर्भरता भी कम होगी।

गगनयान कार्यक्रम के लिए ड्रोग पैराशूट का सफल परीक्षण, भारत के मानव अंतरिक्ष मिशन में बड़ी उपलब्धि

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भारत के मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम गगनयान ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। ड्रोग पैराशूट का योग्यता स्तर भार परीक्षण (Qualification Level Load Test) सफलतापूर्वक DRDO के टर्मिनल बैलिस्टिक्स रिसर्च लैबोरेटरी (TBRL), चंडीगढ़ स्थित रेल ट्रैक रॉकेट स्लेज (RTRS) सुविधा में किया गया।

RTRS एक विशेष उच्च-गति परीक्षण सुविधा है, जिसका उपयोग एयरोडायनामिक और बैलिस्टिक परीक्षणों के लिए किया जाता है।

परीक्षण का विवरण

यह परीक्षण 18 फरवरी 2026 को विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (ISRO), एरियल डिलीवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (DRDO) और TBRL की टीमों के सहयोग से किया गया।

RTRS डायनामिक परीक्षण में ऐसे भारों का अनुकरण किया गया, जो वास्तविक उड़ान में पड़ने वाले अधिकतम भार से भी अधिक थे। इससे पैराशूट के डिज़ाइन में अतिरिक्त सुरक्षा मार्जिन की पुष्टि हुई।

तकनीकी सफलता और स्वदेशी क्षमता

इस परीक्षण से यह साबित हुआ कि भारत उच्च-शक्ति रिबन पैराशूट डिजाइन और निर्माण करने में सक्षम है।
यह उपलब्धि अंतरिक्ष और रक्षा कार्यक्रमों के लिए उन्नत परीक्षण सुविधाएं और तकनीकी विशेषज्ञता प्रदान करने में TBRL के महत्वपूर्ण योगदान को भी दर्शाती है।

रक्षा मंत्री और DRDO प्रमुख की प्रतिक्रिया

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गगनयान ड्रोग पैराशूट के सफल परीक्षण पर DRDO, ISRO और उद्योग को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह परीक्षण आत्मनिर्भर भारत के विजन को आगे बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

DRDO के सचिव एवं अध्यक्ष डॉ. समीर वी. कामत ने भी इस सफल परीक्षण से जुड़ी टीमों को बधाई दी।


डीआरडीओ ने सॉलिड फ्यूल डक्टेड रैमजेट (SFDR) तकनीक का सफल प्रदर्शन किया

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रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने 03 फरवरी, 2026 को लगभग 10:45 बजे ओडिशा तट के पास चांदीपुर स्थित एकीकृत परीक्षण रेंज (ITR) से सॉलिड फ्यूल डक्टेड रैमजेट (SFDR) तकनीक का सफल प्रदर्शन किया। इस सफलता के साथ भारत उन चुनिंदा देशों के विशिष्ट समूह में शामिल हो गया है, जिनके पास यह अत्याधुनिक तकनीक उपलब्ध है। यह तकनीक लंबी दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइलों के विकास में सक्षम बनाती है, जिससे भारत को अपने प्रतिद्वंद्वियों पर महत्वपूर्ण सामरिक बढ़त प्राप्त होगी।

इस परीक्षण के दौरान सभी उप-प्रणालियों ने अपेक्षा के अनुरूप प्रदर्शन किया। ग्राउंड बूस्टर मोटर द्वारा प्रणाली को वांछित मैक संख्या तक पहुँचाने के बाद नोज़ल-रहित बूस्टर, सॉलिड फ्यूल डक्टेड रैमजेट मोटर तथा फ्यूल फ्लो कंट्रोलर ने सफलतापूर्वक कार्य किया। प्रणाली के प्रदर्शन की पुष्टि उड़ान के दौरान प्राप्त डेटा के माध्यम से की गई, जिसे बंगाल की खाड़ी के तट पर चांदीपुर ITR द्वारा तैनात अनेक ट्रैकिंग उपकरणों ने रिकॉर्ड किया।

इस प्रक्षेपण की निगरानी डीआरडीओ की विभिन्न प्रयोगशालाओं के वरिष्ठ वैज्ञानिकों द्वारा की गई, जिनमें डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबोरेटरी (DRDL), हाई एनर्जी मटीरियल्स रिसर्च लेबोरेटरी (HEMRL), रिसर्च सेंटर इमारत (RCI) तथा ITR, चांदीपुर शामिल हैं।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने SFDR तकनीक के सफल प्रदर्शन पर डीआरडीओ और उद्योग जगत को बधाई दी।
वहीं, रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव एवं डीआरडीओ के अध्यक्ष डॉ. समीर वी. कामत ने भी इस सफल उड़ान परीक्षण में शामिल सभी टीमों को शुभकामनाएँ दीं।


DRDO की नई उपलब्धि: 77वें गणतंत्र दिवस पर दिखाएगा हाई-टेक रक्षा सिस्टम

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डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) 77वें गणतंत्र दिवस पर Kartavya Path पर Parade और Bharat Parv 2026 में देश की सुरक्षा के लिए विकसित अपनी प्रमुख तकनीकों को प्रदर्शित करेगा।

DRDO द्वारा प्रदर्शित प्रमुख प्रणालियाँ हैं:

Long Range Anti-Ship Hypersonic Missile (LR-AShM)
DRDO Tableau: ‘Naval Technologies for Combat Submarines’

LR-AShM (Kartavya Path पर प्रदर्शित)

DRDO LR-AShM को लॉन्चर के साथ परेड में दिखाएगा। यह मिसाइल भारतीय नौसेना की तटीय बैटरी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए डिज़ाइन की गई है।

प्रमुख विशेषताएँ:

  • हाइपरसोनिक ग्लाइड मिसाइल

  • स्थिर और गतिशील दोनों लक्ष्यों को निशाना बनाने में सक्षम

  • Mach 10 से शुरू होकर औसत Mach 5 की गति

  • क्वासी-बैलिस्टिक ट्रैजेक्टरी और कई “स्किप”

  • लो-एल्टीट्यूड पर उड़ान, जिससे रडार द्वारा पहचान कठिन

  • स्वदेशी एवियोनिक्स और हाई-एक्यूरेसी सेंसर

  • दो-स्टेज सॉलिड प्रोपल्शन

    • Stage 1 अलग हो जाती है

    • Stage 2 के बाद मिसाइल ग्लाइड करके लक्ष्य पर हमला करती है

DRDO Tableau (Bharat Parv, Red Fort)

DRDO का टेबलो 26 से 31 जनवरी 2026 तक Bharat Parv में प्रदर्शित होगा।

थीम:“Naval Technologies for Combat Submarines”

प्रदर्शित सिस्टम:

  1. Integrated Combat Suite (ICS)

  2. Wire Guided Heavy Weight Torpedo (WGHWT)

  3. Air Independent Propulsion (AIP)

Integrated Combat Suite (ICS)

  • नई पीढ़ी का सबमरीन-आधारित रक्षा प्रणाली

  • सिचुएशनल अवेयरनेस और युद्ध-तैयारी में मदद

  • 8 DRDO प्रयोगशालाओं एवं 150+ इंडस्ट्री पार्टनर्स का सहयोग

Wire Guided Heavy Weight Torpedo (WGHWT)

  • आधुनिक जहाज और सबमरीन खतरों को रोकने हेतु

  • उच्च गति और अधिक दूरी की क्षमता

  • भारतीय नौसेना के लिए मुख्य हथियार

Air Independent Propulsion (AIP)

  • सबमरीन को लंबे समय तक पानी के भीतर रहकर चलने की क्षमता

  • फॉस्फोरिक एसिड फ्यूल सेल और ऑनबोर्ड हाइड्रोजन जनरेटर

  • शांत और स्टील्थ संचालन

  • भविष्य की सबमरीन के लिए मॉड्यूलर डिज़ाइन

परेड में अन्य DRDO प्रणालियाँ

Kartavya Path पर Armed Forces contingents में DRDO के और भी कई सिस्टम प्रदर्शित होंगे, जैसे:

  • Arjun Main Battle Tank

  • Nag Missile System (NAMIS-II)

  • Advanced Towed Artillery Gun System

  • BrahMos Missile

  • Akash

  • Battlefield Surveillance Radar

  • Anti Tank Guided Missile

Aatmanirbhar Bharat की दिशा में DRDO का योगदान

DRDO ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लिए अकादमिक, उद्योग और सेवा संस्थाओं के साथ मिलकर कई उन्नत रक्षा प्रणालियाँ विकसित की हैं।
यह कदम रक्षा तकनीक में स्वदेशी विकास और Aatmanirbhar Bharat के लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण सफलता है।


सागर मैत्री–5 मिशन की शुरुआत: INS सागरध्वनि को वैज्ञानिक सहयोग के लिए किया गया रवाना

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भारतीय नौसेना और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की संयुक्त पहल के तहत समुद्री वैज्ञानिक सहयोग को नई ऊंचाई देने के उद्देश्य से INS सागरध्वनि को 17 जनवरी 2026 को कोच्चि स्थित साउदर्न नेवल कमांड से सागर मैत्री (SM-5) मिशन के लिए रवाना किया गया। यह INS सागरध्वनि का सागर मैत्री कार्यक्रम के अंतर्गत पाँचवां अभियान है।

INS सागरध्वनि को हरी झंडी माननीय सांसद एवं संसदीय स्थायी समिति (रक्षा) के अध्यक्ष राधा मोहन सिंह ने दिखाई। इस अवसर पर संसदीय स्थायी समिति के सदस्य, DRDO के सचिव एवं अध्यक्ष डॉ. समीर वी. कामत, साउदर्न नेवल कमांड के चीफ ऑफ स्टाफ रियर एडमिरल उपल कुंडू, डीजी (नेवल सिस्टम्स एंड मैटीरियल्स) डॉ. आर. वी. हरा प्रसाद, एनपीओएल के निदेशक डॉ. दुव्वुरी शेषगिरि सहित भारतीय नौसेना और DRDO के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

सागर मैत्री भारतीय नौसेना और DRDO की एक प्रमुख सहयोगात्मक पहल है, जो भारत सरकार की ‘महासागर’ (MAHASAGAR – Mutual and Holistic Advancement for Security and Growth Across Regions) परिकल्पना के अनुरूप है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) के देशों के साथ सामाजिक-आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देना तथा समुद्री अनुसंधान के क्षेत्र में वैज्ञानिक सहभागिता को सुदृढ़ करना है।

नेवल फिजिकल एंड ओशनोग्राफिक लेबोरेटरी (NPOL), कोच्चि द्वारा सागर मैत्री कार्यक्रम के तहत नियमित रूप से समुद्र विज्ञान मिशन संचालित किए जा रहे हैं, जिससे IOR देशों के बीच क्षमता निर्माण और दीर्घकालिक वैज्ञानिक सहयोग को मजबूती मिल सके। इसी के अंतर्गत DRDO ने ‘MAITRI’ (Marine & Allied Interdisciplinary Training and Research Initiative) नामक वैज्ञानिक घटक की शुरुआत की है, जिसका उद्देश्य समुद्री अनुसंधान एवं विकास में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ाना है।

इस मिशन के तहत INS सागरध्वनि ऐतिहासिक INS कृष्णा के मार्गों का पुनः अनुसरण करेगी, जिसने 1962-65 के दौरान इंटरनेशनल इंडियन ओशन एक्सपेडिशन में भाग लिया था। सागर मैत्री–5 अभियान के अंतर्गत ओमान, मालदीव, श्रीलंका, थाईलैंड, मलेशिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया और म्यांमार सहित आठ IOR देशों के साथ वैज्ञानिक सहयोग को सुदृढ़ किया जाएगा। इस चरण में मालदीव के साथ संयुक्त समुद्री अनुसंधान की शुरुआत की जा रही है, जिससे वैज्ञानिकों के बीच व्यावसायिक आदान-प्रदान को बढ़ावा मिलेगा।

सागर मैत्री मिशन भारतीय नौसेना के लिए अंडरवॉटर डोमेन अवेयरनेस (UDA) को सुदृढ़ करने की दिशा में DRDO का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। अभियान के दौरान INS सागरध्वनि द्वारा समुद्री और ध्वनिक आंकड़े एकत्र किए जाएंगे, जो रणनीतिक और वैज्ञानिक दोनों दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

INS सागरध्वनि एक विशेष समुद्री ध्वनिक अनुसंधान पोत है, जिसे NPOL द्वारा डिजाइन किया गया और गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) द्वारा निर्मित किया गया है। जुलाई 1994 में कमीशन किया गया यह पोत पिछले तीन दशकों से भारत की समुद्री अनुसंधान क्षमताओं को सशक्त बनाने में अहम भूमिका निभा रहा है।


बेंगलुरु में ‘एयरोनॉटिक्स 2047’ राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ, वायुसेना प्रमुख ने किया उद्घाटन

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एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘एयरोनॉटिक्स 2047’ का शुभारंभ 4 जनवरी 2026 को बेंगलुरु स्थित सेंटर फॉर एयरबोर्न सिस्टम्स (CABS) में हुआ। इस संगोष्ठी का उद्घाटन वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह ने किया। अपने संबोधन में वायुसेना प्रमुख ने एलसीए तेजस की पहली उड़ान के 25 वर्ष पूर्ण होने पर ADA को बधाई दी तथा बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारतीय वायुसेना (IAF) की परिचालन तैयारियों को बनाए रखने के लिए निर्धारित समयसीमा के अनुरूप आपूर्ति सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल दिया।

इस अवसर पर रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव एवं डीआरडीओ के अध्यक्ष डॉ. समीर वी. कामत ने आयात पर निर्भरता कम करने और विकसित भारत @2047 के विजन को साकार करने के लिए स्वदेशी अत्याधुनिक तकनीकों के विकास के महत्व को रेखांकित किया।

यह संगोष्ठी एयरोस्पेस समुदाय के विशेषज्ञों, औद्योगिक भागीदारों, शैक्षणिक संस्थानों, विमानन उत्साही लोगों तथा वक्ताओं को एक साझा मंच प्रदान कर रही है, जहाँ वे एयरोनॉटिक्स के विकास, डिजाइन नवाचार, विनिर्माण तथा भविष्य की संभावनाओं पर अपने विचार साझा कर रहे हैं। एयरोनॉटिक्स-2047 का मुख्य उद्देश्य आधुनिक एयरोस्पेस प्रौद्योगिकियों के विभिन्न पहलुओं का अन्वेषण करना है, जिनमें अगली पीढ़ी के विमानों के लिए विनिर्माण एवं असेंबली, डिजिटल मैन्युफैक्चरिंग, उन्नत लड़ाकू विमानों के लिए एयरोडायनामिक्स, प्रणोदन प्रौद्योगिकियाँ, उड़ान परीक्षण तकनीकें, डिजिटल ट्विन तकनीक, प्रमाणन संबंधी चुनौतियाँ, फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम एवं एवियोनिक्स, लड़ाकू विमानों के रखरखाव की चुनौतियाँ, विमान डिजाइन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तथा एक्चुएटर्स के लिए सटीक विनिर्माण शामिल हैं।

यह संगोष्ठी भारतीय अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों के भविष्य और एलसीए तेजस की यात्रा—स्केच से स्क्वाड्रन तक—को भी रेखांकित करेगी। ADA द्वारा डिजाइन और विकसित किया गया एलसीए तेजस अब तक 5,600 से अधिक सफल उड़ान परीक्षण पूरा कर चुका है। इस कार्यक्रम से 100 से अधिक डिजाइन एवं विकास केंद्र, जिनमें सरकारी प्रयोगशालाएँ, शैक्षणिक संस्थान और उद्योग शामिल हैं, जुड़े रहे। कार्बन कंपोजिट, हल्के पदार्थ, फ्लाई-बाय-वायर फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम, डिजिटल यूटिलिटी मैनेजमेंट सिस्टम, ग्लास कॉकपिट जैसी कई विशिष्ट तकनीकों का विकास कर एलसीए को चौथी पीढ़ी का लड़ाकू विमान बनाया गया।

एलसीए एमके-1ए, स्वदेशी रूप से डिजाइन एवं निर्मित इस लड़ाकू विमान का उन्नत संस्करण है, जो भारतीय वायुसेना की परिचालन आवश्यकताओं को प्रभावी रूप से पूरा करेगा। एलसीए एमके-2 और एलसीए नेवी संस्करण वर्तमान में विकासाधीन हैं। संगोष्ठी के दौरान तेजस कार्यक्रम से जुड़े प्रतिष्ठित एवं अनुभवी विशेषज्ञों द्वारा तकनीकी व्याख्यानों की श्रृंखला भी प्रस्तुत की जाएगी।

एलसीए तेजस के विकास से भारत को अभूतपूर्व लाभ मिला है, क्योंकि देश ने अब स्वदेशी रूप से लड़ाकू विमान बनाने की क्षमता और सामर्थ्य दोनों हासिल कर ली हैं। एलसीए कार्यक्रम भारत के सबसे सफल स्वदेशी रक्षा कार्यक्रमों में से एक है, जिसके माध्यम से भारतीय वायुसेना को एक उत्कृष्ट वायु श्रेष्ठता लड़ाकू विमान प्राप्त हुआ है। अब तक 38 विमान (32 लड़ाकू और 6 प्रशिक्षक) भारतीय वायुसेना की दो स्क्वाड्रनों में शामिल किए जा चुके हैं।

संगोष्ठी के अंतर्गत बड़ी संख्या में पीएसयू, डीपीएसयू, उद्योग और एमएसएमई अपने स्वदेशी रूप से डिजाइन एवं विकसित एयरबोर्न अनुप्रयोगों से जुड़े उत्पादों का प्रदर्शन भी कर रहे हैं।

ऑपरेशन सिंदूर में डीआरडीओ की निर्णायक भूमिका, 68वें स्थापना दिवस पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की सराहना

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रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि डीआरडीओ द्वारा विकसित हथियार प्रणालियों ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान निर्णायक भूमिका निभाई, जो राष्ट्रीय हितों की रक्षा के प्रति संगठन की व्यावसायिकता और प्रतिबद्धता का प्रमाण है। उन्होंने यह बात 01 जनवरी 2026 को नई दिल्ली स्थित डीआरडीओ मुख्यालय में संगठन के 68वें स्थापना दिवस के अवसर पर कही।

रक्षा मंत्री ने स्वदेशी क्षमताओं को सशक्त बनाने तथा सशस्त्र बलों को अत्याधुनिक तकनीक और उपकरणों से लैस करने के लिए डीआरडीओ की सराहना की। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन के दौरान डीआरडीओ के उपकरणों ने निर्बाध रूप से कार्य किया, जिससे सैनिकों का मनोबल बढ़ा।

राजनाथ सिंह ने विश्वास व्यक्त किया कि डीआरडीओ ‘सुदर्शन चक्र’ के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा, जिसकी घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस 2025 के अपने संबोधन में की थी। उन्होंने कहा, “इस पहल के अंतर्गत अगले एक दशक में हमारे महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों को पूर्ण हवाई सुरक्षा प्रदान करने हेतु एयर डिफेंस सिस्टम से लैस करने की जिम्मेदारी डीआरडीओ की है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान आधुनिक युद्ध में वायु रक्षा के महत्व को हमने प्रत्यक्ष रूप से देखा है। मुझे विश्वास है कि डीआरडीओ इस लक्ष्य को शीघ्र प्राप्त करने के लिए पूरी प्रतिबद्धता से कार्य करेगा।”

रक्षा मंत्री ने डीआरडीओ की सराहना करते हुए कहा कि वह केवल तकनीक का सृजन करने वाला ही नहीं, बल्कि विश्वास का निर्माण करने वाला संगठन भी बन गया है, जिससे जनता उसे आशा, विश्वास और निश्चितता के साथ देखती है। निजी क्षेत्र के साथ डीआरडीओ के सहयोग को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि उद्योग, शैक्षणिक संस्थानों और स्टार्ट-अप्स के साथ बढ़ते तालमेल से एक सशक्त और समन्वित रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण हुआ है।

उन्होंने कहा, “डीआरडीओ ने अपने सिस्टम, प्रक्रियाओं और कार्यशैली में निरंतर सुधार किया है। खरीद प्रक्रिया से लेकर परियोजना प्रबंधन तक, उद्योग सहभागिता से लेकर स्टार्ट-अप्स और एमएसएमई के साथ सहयोग तक—हर स्तर पर कार्य को सरल, तेज़ और विश्वसनीय बनाने का प्रयास स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।”

रक्षा मंत्री ने डीआरडीओ से आग्रह किया कि वह तेजी से विकसित हो रहे तकनीकी परिवेश के साथ कदमताल करते हुए समय की मांग के अनुरूप उत्पाद विकसित करता रहे। उन्होंने नवाचार पर निरंतर ध्यान केंद्रित करने और निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने के नए क्षेत्रों की पहचान करने का भी आह्वान किया। डीप टेक और अगली पीढ़ी की तकनीकों पर डीआरडीओ के प्रयासों की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि इस दिशा में प्रगति से न केवल देश की क्षमताएं बढ़ेंगी, बल्कि रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र भी सुदृढ़ होगा।

यह रेखांकित करते हुए कि वर्तमान युग केवल विज्ञान का नहीं, बल्कि निरंतर विकास और सतत सीखने का युग है,राजनाथ सिंह ने कहा कि तकनीक स्कैनिंग, क्षमता आकलन और भविष्य की तैयारी अब केवल शब्द नहीं रह गए हैं। उन्होंने कहा, “दुनिया हर दिन बदल रही है। तकनीक, नवाचार और युद्ध के नए क्षेत्र तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, जिससे कल का ज्ञान आज अप्रासंगिक हो सकता है। हमें यह कभी नहीं मानना चाहिए कि सीखने की प्रक्रिया समाप्त हो गई है। हमें लगातार सीखते रहना होगा और स्वयं को चुनौती देते हुए नई पीढ़ी के लिए मार्ग प्रशस्त करना होगा।”

बैठक के दौरान, रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव एवं डीआरडीओ के अध्यक्ष डॉ. समीर वी. कामत ने रक्षा मंत्री को संगठन की वर्तमान आरएंडडी गतिविधियों, 2025 की उपलब्धियों, उद्योग, स्टार्ट-अप्स एवं अकादमिक संस्थानों को बढ़ावा देने की विभिन्न पहलों तथा 2026 के रोडमैप की जानकारी दी। रक्षा मंत्री को वर्ष 2026 के लिए निर्धारित प्रमुख लक्ष्यों और संगठन में सुधार हेतु किए जा रहे विभिन्न सुधारों से भी अवगत कराया गया।

इस अवसर पर रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ भी उपस्थित थे। इसके अलावा, डीआरडीओ के महानिदेशक, कॉरपोरेट निदेशक तथा अन्य वरिष्ठ वैज्ञानिक और अधिकारी भी समारोह में शामिल हुए।

राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस 2025 पर बम निष्क्रियकरण प्रणालियों के लिए नया भारतीय मानक IS 19445:2025 जारी

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नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में आयोजित राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस 2025 के अवसर पर केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री प्रल्हाद जोशी ने IS 19445:2025 – “बम निष्क्रियकरण प्रणालियां — प्रदर्शन मूल्यांकन और आवश्यकताएं” नामक नया भारतीय मानक जारी किया। यह मानक बम निष्क्रियकरण अभियानों में सुरक्षा और मानकीकरण को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

मानक की आवश्यकता

IS 19445:2025 के निर्माण की पहल गृह मंत्रालय और टर्मिनल बैलिस्टिक रिसर्च लेबोरेटरी (TBRL), DRDO के अनुरोध पर की गई। इसकी प्रमुख वजहें थीं—

  • सुरक्षा और नागरिक एजेंसियों द्वारा बम निष्क्रियकरण प्रणालियों का बढ़ता उपयोग

  • ऐसे उपकरणों के लिए अब तक किसी समर्पित भारतीय मानक का अभाव

  • अंतरराष्ट्रीय मानकों की सीमित उपलब्धता और भारतीय खतरा परिदृश्य से उनका पूर्ण मेल न होना

बम कंबल, बम बास्केट और बम इनहिबिटर जैसी प्रणालियां विस्फोटक खतरों को कम करने में व्यापक रूप से उपयोग की जाती हैं। इनके सुरक्षित और प्रभावी उपयोग के लिए कठोर एवं मानकीकृत परीक्षण आवश्यक हैं।

IS 19445:2025 की प्रमुख विशेषताएं

यह मानक बम निष्क्रियकरण प्रणालियों के विस्फोट दबाव (Blast Load) और छर्रे प्रभाव (Splinter Effect) के मूल्यांकन हेतु एक व्यापक ढांचा प्रदान करता है। इसमें शामिल हैं—

  • परीक्षण उपकरणों और परीक्षण क्षेत्र की आवश्यकताएं

  • निष्पक्ष प्रदर्शन मूल्यांकन की प्रक्रियाएं

  • परीक्षण पद्धतियां, उपकरण, नमूने और स्वीकृति मानदंड

यह मानक परीक्षण प्रायोजकों, निर्माताओं और मान्यता प्राप्त परीक्षण एजेंसियों के लिए एक समान परीक्षण, प्रमाणन और खरीद प्रक्रिया का आधार बनेगा।

विकास प्रक्रिया

IS 19445:2025 का विकास आर्म्स एंड एम्युनिशन फॉर सिविलियन यूज सेक्शनल कमेटी (PGD 28) के अंतर्गत सहमति आधारित प्रक्रिया से किया गया। इसके लिए बम निष्क्रियकरण प्रणालियां पैनल (PGD 28/P1) का गठन किया गया, जिसकी संयोजकता TBRL, DRDO ने की।

इस प्रक्रिया में DRDO, NSG, CAPF, राज्य पुलिस, AAI, NCRTC, BPR&D, सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के निर्माता तथा परीक्षण विशेषज्ञों सहित अनेक हितधारकों ने सक्रिय भागीदारी की, जिससे यह मानक मैदानी जरूरतों और सुरक्षा आवश्यकताओं के अनुरूप बन सका।

वैश्विक मानकों के अनुरूप

मानक के निर्माण में अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं को ध्यान में रखते हुए उन्हें भारतीय खतरा परिदृश्य और परिचालन परिस्थितियों के अनुसार अनुकूलित किया गया है। इससे वैश्विक सामंजस्य के साथ राष्ट्रीय आवश्यकताओं की पूर्ति सुनिश्चित होगी।

प्रमुख लाभ

  • स्पष्ट और वस्तुनिष्ठ प्रदर्शन मूल्यांकन मानदंड

  • ऑपरेटरों, प्रथम प्रतिक्रियाकर्ताओं और आम नागरिकों की सुरक्षा में वृद्धि

  • खरीद, परीक्षण और प्रमाणन में पारदर्शिता और एकरूपता

  • मेक इन इंडिया के तहत स्वदेशी नवाचार को बढ़ावा

  • विभिन्न एजेंसियों के बीच उपकरणों की विश्वसनीयता और संगतता में सुधार

उपभोक्ता मामले विभाग की सचिव निधि खरे ने बताया कि यह मानक स्वैच्छिक रूप से अपनाने के लिए है और इससे गुणवत्ता आधारित निर्माण को प्रोत्साहन मिलेगा तथा सुरक्षा अभियानों में प्रयुक्त उपकरणों पर भरोसा बढ़ेगा।

IS 19445:2025 का विमोचन भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) की राष्ट्रीय सुरक्षा, जन-सुरक्षा और तकनीकी आत्मनिर्भरता के प्रति प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करता है।

डीआरडीओ ने फाइटर एयरक्राफ्ट एस्केप सिस्टम का हाई-स्पीड रॉकेट-स्लेड परीक्षण सफलतापूर्वक किया

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रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने नियंत्रित वेग पर फाइटर विमान के एस्केप सिस्टम का सफल हाई-स्पीड रॉकेट-स्लेड परीक्षण किया है। चंडीगढ़ स्थित टर्मिनल बैलिस्टिक्स रिसर्च लेबोरेटरी (TBRL) के रेल ट्रैक रॉकेट स्लेड (RTRS) सुविधा में किए गए इस परीक्षण ने कैनोपी सेवरेंस, इजेक्शन सीक्वेंसिंग और एयरक्रू रिकवरी को सफलतापूर्वक प्रमाणित किया।

यह परीक्षण एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के सहयोग से किया गया। यह जटिल डायनामिक परीक्षण भारत को उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में शामिल करता है, जिनके पास उन्नत इन-हाउस एस्केप सिस्टम परीक्षण क्षमता मौजूद है।

स्टैटिक परीक्षणों—जैसे नेट टेस्ट या ज़ीरो-ज़ीरो टेस्ट—की तुलना में डायनामिक इजेक्शन टेस्ट अधिक जटिल होते हैं और इजेक्शन सीट की कार्यक्षमता व कैनोपी सेवरेंस सिस्टम की प्रभावशीलता का वास्तविक मूल्यांकन करते हैं।

परीक्षण में LCA विमान के फोरबॉडी के साथ एक डुअल-स्लेड सिस्टम को ठोस प्रणोदक रॉकेट मोटरों के चरणबद्ध प्रज्वलन से नियंत्रित गति तक पहुंचाया गया।

इजेक्शन प्रक्रिया के दौरान प्रयुक्त एंथ्रोपोमोर्फिक टेस्ट डमी ने पायलट द्वारा अनुभव किए जाने वाले महत्वपूर्ण लोड, मोमेंट और एक्सेलेरेशन को रिकॉर्ड किया। पूरे इजेक्शन अनुक्रम को ऑनबोर्ड और ग्राउंड-बेस्ड इमेजिंग सिस्टम्स ने कैप्चर किया। परीक्षण को भारतीय वायुसेना (IAF) और इंस्टीट्यूट ऑफ एयरोस्पेस मेडिसिन के अधिकारियों ने प्रत्यक्ष रूप से देखा।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने DRDO, IAF, ADA, HAL और उद्योग जगत को इस महत्वपूर्ण उपलब्धि पर बधाई दी और इसे आत्मनिर्भरता की दिशा में भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमता का एक बड़ा मील का पत्थर बताया।

रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव और DRDO अध्यक्ष डॉ. समीर वी. कामत ने भी इस सफल प्रदर्शन से जुड़े DRDO वैज्ञानिकों व टीम की सराहना की।

DRDO का इंडस्ट्री आउटरीच प्रोग्राम: आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन को गति देने की दिशा में बड़ा कदम

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सरकार के आत्मनिर्भरता और विकसित भारत के विज़न को आगे बढ़ाते हुए, DRDO ने 1 दिसंबर 2025 को नई दिल्ली स्थित DRDO भवन में एक Industry Outreach Programme आयोजित किया। इस कार्यक्रम में उत्तरी भारत की DRDO प्रयोगशालाओं के वैज्ञानिकों और उनकी इंडस्ट्री पार्टनर्स ने भाग लिया। कुल 18 DRDO प्रयोगशालाओं के 220 वैज्ञानिक और विभिन्न रक्षा उद्योगों के 271 प्रतिनिधि इसमें शामिल हुए।

कार्यक्रम में रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव और DRDO अध्यक्ष डॉ. समीर वी. कामत मुख्य अतिथि थे, जबकि सचिव (रक्षा उत्पादन) संजीव कुमार विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। इस दौरान ‘DRDO की ToT Policy – 2025’ को लागू करने की नई प्रक्रिया भी जारी की गई।

कार्यक्रम की मुख्य विशेषताएं

कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण ओपन हाउस चर्चा रहा, जिसमें विशिष्ट अतिथियों, DRDO विशेषज्ञों और सचिव (रक्षा उत्पादन) ने उद्योग जगत से प्राप्त प्रश्नों, सुझावों और चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की। इस चर्चा का उद्देश्य PSUs और निजी उद्योगों के साथ मिलकर स्वदेशी रक्षा उत्पादन से जुड़े जटिल मुद्दों के समाधान तलाशना था।

इस दौरान DRDO मुख्यालय और विभिन्न प्रयोगशालाओं के वैज्ञानिकों के बीच इन-हाउस ब्रेनस्टॉर्मिंग सत्र भी आयोजित किया गया। DRDO के कॉरपोरेट निदेशकों ने स्वदेशी अनुसंधान परियोजनाओं, नीतियों और प्रक्रियाओं की जानकारी साझा की, जो सेनाओं और अन्य सरकारी एजेंसियों के लिए उपयोगी साबित होंगी।

मुख्य वक्तव्य

DRDO अध्यक्ष डॉ. समीर वी. कामत ने भारतीय उद्योग की क्षमता पर विश्वास जताते हुए कहा कि आने वाले पाँच वर्षों में सरकारी नीतियाँ और परिपक्व होंगी तथा देश का स्वदेशी रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र कई गुना बढ़ेगा। उन्होंने DRDO के साथ साझेदारी में रक्षा क्षेत्र की विभिन्न तकनीकी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उद्योगों को व्यापक अवसर उपलब्ध होने की बात कही।

सचिव (रक्षा उत्पादन) संजीव कुमार ने सरकार की स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देने वाली नीतियों पर प्रकाश डाला और कहा कि वास्तविक आत्मनिर्भरता तभी संभव है जब डिज़ाइन से लेकर बड़े पैमाने पर निर्माण तक पूरा चक्र देश में ही पूरा किया जाए।

इंडस्ट्री सहयोग पर जोर

DG (Production Coordination & Services Interaction) डॉ. चंद्रिका कौशिक ने DRDO की इंडस्ट्री के साथ मिलकर स्वदेशीकरण बढ़ाने की पहलों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि भारत अब रक्षा उपकरणों का आयातक होने से आगे बढ़कर शुद्ध रक्षा निर्यातक देश के रूप में उभर रहा है। उन्होंने उद्योगों को निरंतर R&D और DRDO के साथ गहरी सहभागिता के लिए प्रेरित किया।


DRDO और फ्रांस के DGA के बीच तकनीकी समझौता

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रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) और डायरेक्टरेट जनरल ऑफ आर्मामेंट्स (DGA), फ्रांस के बीच रक्षा अनुसंधान और विकास में सहयोग को गहरा करने के लिए एक तकनीकी समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। सचिव, विभाग रक्षा R&D और DRDO के अध्यक्ष, डॉ. समीर वी. कामत और नेशनल आर्मामेंट्स डायरेक्टर, DGA फ्रांस, लेफ्टिनेंट जनरल गेल डियाज़ दे टुएस्ता ने यह समझौता 20 नवंबर 2025 को DRDO भवन, नई दिल्ली में किया।

यह रणनीतिक साझेदारी दोनों देशों/संगठनों की साझा विशेषज्ञता और संसाधनों का लाभ उठाकर भविष्य की रक्षा चुनौतियों के लिए नवाचारात्मक समाधान विकसित करने का उद्देश्य रखती है। यह संयुक्त अनुसंधान और प्रशिक्षण कार्यक्रम, परीक्षण गतिविधियों, सूचना का आदान-प्रदान, कार्यशालाओं और सेमिनारों के आयोजन के लिए औपचारिक ढांचा प्रदान करती है, जिससे रक्षा R&D में कौशल और ज्ञान में वृद्धि होगी।

इस समझौते के तहत उपकरण, ज्ञान और प्रौद्योगिकियों का आदान-प्रदान दोनों देशों के लिए उपलब्ध होगा। समझौते में सहयोग के मुख्य क्षेत्र निम्नलिखित हैं:

  • एयरोनॉटिकल प्लेटफॉर्म्स

  • अनमैंड वाहन

  • रक्षा अनुप्रयोगों के लिए उन्नत सामग्री

  • साइबर सुरक्षा

  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI)

  • अंतरिक्ष और नेविगेशन

  • उन्नत प्रणोदन (Advanced Propulsion)

  • उन्नत सेंसर

  • क्वांटम तकनीक

  • जल-तल प्रौद्योगिकियां (Underwater Technologies)

  • और अन्य पारस्परिक हित वाले क्षेत्र

दोनों पक्षों ने विश्वास व्यक्त किया कि यह सहयोग राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक रक्षा तकनीक में प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान देगा।


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